नई सड़कें बिछाना चाहते थे बगीचा काट खाना चाहते थे ज़बरदस्ती रिहाई मिल रही है उन्हें जो क़ैदखाना चाहते थे कहाँ आ कर रुके हैं देखिए ना कहाँ तक साथ जाना चाहते थे
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हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
Sahir Ludhianvi
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वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया दरख़्त काट के जब थक गया लकड़हारा तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया
Zubair Ali Tabish
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क्या बैठ जाएँ आन के नज़दीक आप के बस रात काटनी है हमें आग ताप के कहिए तो आप को भी पहन कर मैं देख लूँ मा'शूक़ यूँँ तो हैं ही नहीं मेरी नाप के
Farhat Ehsaas
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उस की तस्वीरें हैं दिलकश तो होंगी जैसी दीवारें हैं वैसा साया है एक मैं हूँ जो तेरे क़त्ल की कोशिश में था एक तू है जो जेल में खाना लाया है
Tehzeeb Hafi
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डाली है ख़ुद पे ज़ुल्म की यूँँ इक मिसाल और उस के बग़ैर काट दिया एक साल और
Subhan Asad
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ज़रा सी देर उठने में हुई क्या लगे सब पाँव दक्षिण ओर करने
Atul K Rai
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चलेंगे आख़िरी तक साथ कहते हैं बहुत लेकिन बहुत कम लोग हैं जो आख़िरी तक साथ चलते हैं
Atul K Rai
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उम्मीदों का मरना या'नी मर जाने की तैयारी है!
Atul K Rai
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कन्हैया राधिका के प्रेम से परिचित नहीं होते जो प्रेमी प्रेमिका को ले के घर से भाग जाते हैं
Atul K Rai
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बहारें हों या वीरानी से सब जंगल गुज़रते हैं रुदन हो हास्य हो सब को बराबर बाँटता है वो
Atul K Rai
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