निकलने को न जाने दिल से जाँ क्या क्या नहीं निकला नहीं निकला तो बस इक इश्क़ और शहर-ए-मुज़फ़्फ़रपुर
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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उस के झूठे इश्क़ को कर लेता मैं तस्लीम लेकिन उस का लहजा और इरादा बे-वफ़ाई से भरा था
A R Sahil "Aleeg"
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ये इश्क़ भी तो है रोलेट ऐक्ट सा जिस में कोई गवाह न कोई सुबूत सिर्फ़ सज़ा
A R Sahil "Aleeg"
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मुझ पर ये ज़ुल्म-ए-हुस्न कोई कम नहीं यहाँ बोसे की ख़्वाहिशात शिकायत के साथ साथ इस आशिक़ी ने मुझ को सुख़न-वर बना दिया मैं शे'र कह रहा हूँ मुहब्बत के साथ साथ
A R Sahil "Aleeg"
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मैं मेरा इश्क़ मेरी आशिक़ी मेरी वफ़ा सब कुछ मेरा गुमनाम ठहरा न मैं मजनूँ न मैं राँझा न मैं फ़रहाद फिर क्यूँ याद रक्खे कोई मुझ को
A R Sahil "Aleeg"
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मेरे इश्क़ का क़त्ल कर ख़ुश है 'साहिल' यही थी तेरे दिल की हसरत मुबारक
A R Sahil "Aleeg"
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