पागल था मैं भी गैरों से क्या माँगता रहा उम्मीद थी वफ़ा की वफ़ा माँगता रहा मैं उस सेे माँगता भी तो क्या और माँगता अपनी वफ़ा का यार सिला माँगता रहा
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
Shabeena Adeeb
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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तसव्वुर था उसे ख़ुद की मुकम्मल सी ग़ज़ल कहता नदामत है कि वो दुल्हन किसी की बन चुकी होगी
Rovej sheikh
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ये तू किस दुश्मनी की दिल में कसक लाया है ज़ख़्म भरने के लिए यार नमक लाया है
Rovej sheikh
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तुम को हम से उलझन कौन हो तुम इश्क़ के जानी दुश्मन कौन हो तुम जिस को दिया था कंगन तुम वो नहीं लौटा रही हो कंगन कौन हो तुम
Rovej sheikh
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माथे से उस की आँख तक पहुँचा ही था घबरा के उस ने कह दिया अब यार बस
Rovej sheikh
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तन्हा कमरे में सदा बैठ के रोने का मज़ा हम ग़रीबों के सिवा कौन समझ सकता है
Rovej sheikh
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