पढ़ा लिखा हो जो आशिक़ उसे सहूलत है लुग़त में भी लिखा है लत के पहले उल्फ़त है
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मैं उस सेे दूर था तो शोर था साजिश है, साजिश है उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा
Kumar Vishwas
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घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए
Azhar Iqbal
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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
Ahmad Faraz
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भरे हुए जाम पर सुराही का सर झुका तो बुरा लगेगा जिसे तेरी आरज़ू नहीं तू उसे मिला तो बुरा लगेगा ये आख़िरी कंपकंपाता जुमला कि इस तअ'ल्लुक़ को ख़त्म कर दो बड़े जतन से कहा है उस ने नहीं किया तो बुरा लगेगा
Zubair Ali Tabish
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चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
Hasrat Mohani
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ग़म की चिंगारियों को हवा दीजिए दीजिए दीजिए बद-दुआ दीजिए
Raj
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उस जगह पे इन उजालों ने की होगी ख़ुद-कुशी जिस जगह मश्कूक हालत में मिला उल्टा दिया
Raj
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आजिज़ हूँ ऐ ख़ुदा ज़बाँ के इख़्तिलाफ़ से क़ुरआन भी है काफ़ से काफ़िर भी काफ़ से
Raj
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वो तारे गिरने पे ख़्वाहिश करती है मैं तारे गिरने की ख़्वाहिश करता हूँ
Raj
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उस की पाकीज़ा जवानी पर्दे की पाबंद होगी किस ने सोचा था कि मंदिर में कभी ताले लगेंगे
Raj
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