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परिंदे नहीं हम मगर पर हमारे ज़मीं की हिफ़ाज़त करें आ समाँ से

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शबो रोज़ की चाकरी ज़िन्दगी की मुयस्सर हुईं रोटियाँ दो घड़ी की नहीं काम आएँ जो इक दिन मशीनें ज़रूरत बने आदमी आदमी की कि कल शाम फ़ुरसत में आई उदासी बता दी मुझे क़ीमतें हर ख़ुशी की किया क्या अमन जी ने बाइस बरस में कभी जी लिया तो कभी ख़ुद-कुशी की ग़मों को ठिकाने लगाते लगाते घड़ी आ गई आदमी के ग़मी की ये सारी तपस्या का कारण यही है मिसालें बनें तो बनें सादगी की

Aman G Mishra

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ज़िन्दगी सब कारना में जानती है ज़िन्दगी से मुँह छिपा कर क्या करेंगे

Aman G Mishra

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ख़ुश-मिज़ाजी यही कि जी रहा हूँ और दुख भी कि इस जहान में हूँ

Aman G Mishra

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जिन लोगों पर मैं विश्वास जताता हूँ उन लोगों से ही धोखा खा जाता हूँ मैं ने लोगों के चेहरे पढ़ रक्खे हैं फिर भी उन की बातों में आ जाता हूँ

Aman G Mishra

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गाँव तज कर; अब नहीं होते रुआँसे गाँव में इक घर बना कर क्या करेंगे

Aman G Mishra

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