शबो रोज़ की चाकरी ज़िन्दगी की मुयस्सर हुईं रोटियाँ दो घड़ी की नहीं काम आएँ जो इक दिन मशीनें ज़रूरत बने आदमी आदमी की कि कल शाम फ़ुरसत में आई उदासी बता दी मुझे क़ीमतें हर ख़ुशी की किया क्या अमन जी ने बाइस बरस में कभी जी लिया तो कभी ख़ुद-कुशी की ग़मों को ठिकाने लगाते लगाते घड़ी आ गई आदमी के ग़मी की ये सारी तपस्या का कारण यही है मिसालें बनें तो बनें सादगी की
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लोग सुन कर वाह-वाही करते हैं हर बार ही रोज़ ही रोता हूँ अब तो मैं किसी सुर-ताल में
nakul kumar
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इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए
Vipul Kumar
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जहाँ पंखा चल रहा है वहीं रस्सी भी पड़ी है मुझे फिर ख़याल आया, अभी ज़िन्दगी पड़ी है
Zubair Ali Tabish
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ये मुहब्बत की किताबें कौन यूँँ कब तक पढ़े कौन मारे रोज़ ही इक बात पे अपना ही मन
nakul kumar
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मौत वो है जो आए सजदे में ज़िन्दगी वो जो बंदगी हो जाए क्या कहूँ आप कितने प्यारे हैं इतने प्यारे कि प्यार ही हो जाए
Vikram Gaur Vairagi
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ज़िन्दगी सब कारना में जानती है ज़िन्दगी से मुँह छिपा कर क्या करेंगे
Aman G Mishra
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परिंदे नहीं हम मगर पर हमारे ज़मीं की हिफ़ाज़त करें आ समाँ से
Aman G Mishra
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सुख़न की राह में बढ़ते मुसाफ़िर सँभल कर, सामने कोहरा घना है
Aman G Mishra
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जिन लोगों पर मैं विश्वास जताता हूँ उन लोगों से ही धोखा खा जाता हूँ मैं ने लोगों के चेहरे पढ़ रक्खे हैं फिर भी उन की बातों में आ जाता हूँ
Aman G Mishra
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ख़ुश-मिज़ाजी यही कि जी रहा हूँ और दुख भी कि इस जहान में हूँ
Aman G Mishra
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