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सफ़र रुक गया और चलने के बा'द बचा ही नहीं घर ये जलने के बा'द

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ज़िंदगी जिस दिन मिरी तू जान लेता बात मेरी तू उसी दिन मान लेता डूबते आख़िर नहीं वो सब हमारे तब अगर गहराई मेरी जान लेता

Shivam Raahi Badayuni

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उदासी जिस तरह देखी बदन में है उसे कहना कहीं मर ही न जाए हम घुटन में है उसे कहना हमारे लोग जो घर तक बचा पाए नहीं अपना गए मिट आग की ऐसी जलन में है उसे कहना

Shivam Raahi Badayuni

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उम्मीद नहीं कोई हमें याद करोगे ऐसा है मिरा ज़ख़्म के बर्बाद करोगे है बात ख़मोशी की उदासी की हमारी क्या आप हमें दर्द से आज़ाद करोगे

Shivam Raahi Badayuni

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हमारा ग़म हमारे ही बदन मैं पल रहा कैसे अभी तक वो दिया आँधी में इतना जल रहा कैसे कही वो थक चुका होगा बशर चलते हुए इतना बिना ही प्यास के उस का सहारा चल रहा कैसे

Shivam Raahi Badayuni

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और फिर तय ये हुआ चेहरा नहीं देखेंगे जाने वालों का कभी रस्ता नहीं देखेंगे आज चढ़ जा तू ये ऊँचाई कि अब मंज़िल पर कल भला लोग तुझे बढ़ता नहीं देखेंगे

Shivam Raahi Badayuni

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