शाइरों से मिल के देखो ज़िन्दगी क्या चीज़ है फिर तुम्हें एहसास होगा शा'इरी क्या चीज़ है सब निशानी ले के मुझ सेे उस ने बोला आख़िरी मैं अभी तक सोच में हूँ आख़िरी क्या चीज़ है
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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मिला था जिस बग़ीचे में वो अब शमशान लगता है मुहब्बत ने ये कैसे दिन दिखाए हैं मुहब्बत में
"Nadeem khan' Kaavish"
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यहाँ अब कौन दिल का कायल है ,बता हाँ कुछ लिबास होते तो कुछ बात थी
"Nadeem khan' Kaavish"
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साथ था जिन शामों में तू छोड़कर वो अब तो हर शा में सुहानी लिख रहे हैं
"Nadeem khan' Kaavish"
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यार तेरी चीज़ सब हम ने हटा दी इस नज़र से फेंक आया वो घड़ी भी जो कि लाई थी शहर से
"Nadeem khan' Kaavish"
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निवाले छीन लेती है हुकूमत अपने हाथों से ख़ुदाया भूख लगना भी यहाँ पर इक सियासत है
"Nadeem khan' Kaavish"
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