सिकंदर से कभी आँखें मिलाना चाहता था वही आँखें उठाना आज भारी हो गया है नहीं जो मानता था हार छोटे खेल में भी वही हारा ज़माने से लिखारी हो गया है
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मैं उस से ये तो नहीं कह रहा जुदा न करे मगर वो कर नहीं सकता तो फिर कहा न करे वो जैसे छोड़ गया था मुझे उसे भी कभी ख़ुदा करे कि कोई छोड़ दे ख़ुदा न करे
Tehzeeb Hafi
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दिल के दरवाज़े भेड़ कर देखो जख़्म सारे उधेड़ कर देखो बंद कमरे में आईने से कभी तुम मेरा जिक्र छेड़ कर देखो
Sandeep Thakur
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जहाँ से जी न लगे तुम वहीं बिछड़ जाना मगर ख़ुदा के लिए बे-वफ़ाई न करना
Munawwar Rana
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दौलत शोहरत बीवी बच्चे अच्छा घर और अच्छे दोस्त कुछ तो है जो इन के बा'द भी हासिल करना बाक़ी है कभी-कभी तो दिल करता है चलती रेल से कूद पड़ूॅं फिर कहता हूँ पागल अब तो थोड़ा रस्ता बाक़ी है
Zia Mazkoor
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फिर उसी बे-वफ़ा पे मरते हैं फिर वही ज़िंदगी हमारी है
Mirza Ghalib
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वही जो मौत से पहले हमारी मौत होती है नहीं होती हैं आँखें नम मगर इक सौत होती है
Vishakt ki Kalam se
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तुम्हारी सोच में मिलते नहीं हम हमारी बात ही कुछ और है अब
Vishakt ki Kalam se
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सुना है आज कल पढ़ने लगे हैं वो हमें भी लिखी हर शा'इरी हम भी दुबारा पढ़ रहे हैं
Vishakt ki Kalam se
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ज़रूरी तो नहीं उस की हँसी में प्यार ही हो हँसी के इस जहाँ में और भी मतलब बहुत हैं
Vishakt ki Kalam se
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तराज़ू हाथ में लो भाव को अब तोलना होगा अभी तक चुप रहे थे तुम मगर अब बोलना होगा
Vishakt ki Kalam se
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