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सिर्फ़ होली ही नहीं ईद पे भी रंग उड़ेल हिंदवी साख़ में बढ़वार यूँँ नाबाद रहे रंग ऐसा कि तमाम उम्र नहीं छूटे फिर रिश्ता ऐसा कि क़यामत में भी आबाद रहे

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झूठ जुमला है कि मर्दों को नहीं होता है दर्द हर बशर की रूह को ग़म सालता तो ख़ूब है दोस्ती कर ली हो जिसने रंज-ओ-ग़म की शाम से दर्द ही दुश्मन है उसका दर्द ही महबूब है

Nityanand Vajpayee

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ज़रा सी कामयाबी पर ग़ुरूर उन को है इतना क्यूँ ये दुनिया ख़्वाब है फिर ख़्वाब की औक़ात ही क्या है

Nityanand Vajpayee

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ये क्या किया कि तुम ने सर-ए-आम कह दिया मेरे किए हुए को सही काम कह दिया मैं ने किए हज़ारों करम इस के बावजूद बदनाम बशर ने मुझे बदनाम कह दिया

Nityanand Vajpayee

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मिलो जब भी कभी जाहिल से तो ख़ामोश रहिए आप मियाँ जाहिल को आलिम से अजब तकलीफ़ होती है

Nityanand Vajpayee

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तड़प मेरे कलेजे की समझ भी जाओ जान-ए-जाँ ज़ियादा और खुल कर क्या कहूँ बस घर चले आते

Nityanand Vajpayee

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