सुनता है भला कौन यहाँ दर्द किसी का मैं ख़ुश था चलो मेरी परेशानी को पूछा उस वक़्त इन आँखों में मिरी पानी भर आया जब शहर में मुझ से किसी ने पानी को पूछा
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तेरी आँखों में जो इक क़तरा छुपा है, मैं हूँ जिस ने छुप छुप के तेरा दर्द सहा है, मैं हूँ एक पत्थर कि जिसे आँच न आई, तू है एक आईना कि जो टूट चुका है, मैं हूँ
Fauziya Rabab
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राम होने में या रावण में है अंतर इतना एक दुनिया को ख़ुशी दूसरा ग़म देता है हम ने रावण को बरस दर बरस जलाया है कौन है वो जो इसे फिर से जनम देता है
Kumar Vishwas
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मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं
Jawwad Sheikh
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उन की सोहबत में गए सँभले दोबारा टूटे हम किसी शख़्स को दे दे के सहारा टूटे ये अजब रस्म है बिल्कुल न समझ आई हमें प्यार भी हम ही करें दिल भी हमारा टूटे
Vikram Gaur Vairagi
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मंज़िलों का कौन जाने रहगुज़र अच्छी नहीं उस की आँखें ख़ूब-सूरत है नज़र अच्छी नहीं
Abrar Kashif
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ज़रूरत क्या तिजारत-गार को ख़ुद हाथ रँगने की ठिकाने कुछ लगाना हो अगर सरकार बैठी है
Mohit Subran
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ज़रा से शक पे हुआ ख़त्म राब्ता लेकिन ज़रा सा शक न हुआ ख़त्म दरमियाँ से मगर
Mohit Subran
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ज़रा सा चूक गया मैं तुझे समझने में वगरना ज़ीस्त तिरी धज्जियाँ उड़ाता मैं
Mohit Subran
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तुम्हें तो ख़ुश-नुमा ख़ुश-रंग है हर एक मौसम ही मगर फ़ुटपाथ के लोगों पे हर मौसम मुसीबत है
Mohit Subran
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उबलते अश्क न रख रोक के बहा दे इन्हें कहीं ये अश्क न पलकें तिरी जला डालें
Mohit Subran
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