था मुश्त-ए-ख़ाक का ये जिस्म मुश्त-ए-ख़ाक बन जाना इसे आख़िर में जाना क़ब्र में या राख बन जाना
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा
Javed Akhtar
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है
Rahat Indori
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सबका लिखा सब अच्छा सब के वास्ते मुमकिन नहीं सब को मिलेंगे मन मुताबिक़ रास्ते मुमकिन नहीं
"Dharam" Barot
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वो समुंदर है वो प्यासा ही रखेगा मैं सिमट जाऊँगा तुझ में ,हूँ मैं तालाब
"Dharam" Barot
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मोर्चा हम ने सँभाला है ये भी इक वहम था खेल हर दिन ही पलट देता खिलाड़ी इक नया
"Dharam" Barot
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क़ैद कर के मत करे आज़ाद मुझ को अब हुनर बाक़ी नहीं उड़ने का मुझ में
"Dharam" Barot
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पुल पे से ये कश्तियाँ मैं देखता हूँ थी ज़रूरत जो कभी वो शौक है अब
"Dharam" Barot
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