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तू इस तरह से मिला फिर मलाल भी न रहा तेरे ख़याल में अपना ख़याल भी न रहा कुछ इस अदास झुकी थी हया से आँख तेरी हमारी आँख में कोई सवाल भी न रहा

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ये मेरी ज़िद ही ग़लत थी कि तुझ सेा बन जाऊँ मैं अब न अपनी तरह हूँ न तेरे जैसा हूँ हमारे बीच ज़माने की बद-गुमानी है मैं ज़िंदगी से ज़रा कम ही बात करता हूँ

Subhan Asad

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जब बुलंदी का गुमाँ था तो नहीं याद आई अपनी परवाज़ से टूटे तो ज़मीं याद आई वही आँखें कि जो ईमान-शिकन आँखें हैं उन्हीं आँखों की हमें दावत-ए-दीं याद आई

Subhan Asad

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जब भी उस कूचे में जाना पड़ता है ज़ख़्मों पर तेज़ाब लगाना पड़ता है उस के घर से दूर नहीं है मेरा घर रस्ते में पर एक ज़माना पड़ता है

Subhan Asad

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पकड़ में आती नहीं है कभी वो शाख़-ए-विसाल हम एक बोसा-ए-गुल के लिए तरसते हैं

Subhan Asad

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मेरे शाइ'र! मैं वही हुस्ने-दिलावेज़, जिसे चाहने वाले बहुत, जानने वाले कम हैं

Subhan Asad

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