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तू तो फिर भी तू है अपनी ज़ात पर शक है बात ये है अब मुझे हर बात पर शक है

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जी ही जी में कई अहद-ए-वफ़ा करते-करते जी ही जी में वो कई बार मुकरता होगा जाने किस ध्यान में बैठा हुआ होगा वो शख़्स जाने किन रंगों से कमरे को वो भरता होगा

MIR SHAHRYAAR

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ज़रूरत थी बस बात करने की हम को मगर बात करने की फ़ुर्सत किसे है अब इस बस्ती में सब ख़ुदा बन गए हैं अब इक दूसरे की ज़रूरत किसे है

MIR SHAHRYAAR

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गजरा देखो कंगन देखो कैसी सजी है दुल्हन देखो उलझी उलझी खोई खोई कब से बैठी है बिरहन देखो

MIR SHAHRYAAR

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ज़माने से पड़े सूखे गुलाब देखोगी कोई किताब पढ़ोगी तो याद आऊँगा कभी मोहब्बतों की उलझी उलझी राहों पर जो तन्हा तन्हा चलोगी तो याद आऊँगा

MIR SHAHRYAAR

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किस तरह हम बिखर गए जानाँ सब दुआ बे-असर गए जानाँ मैं तो ख़ुश था मगर ये चारा-गर मुझ को बर्बाद कर गए जानाँ

MIR SHAHRYAAR

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