उस मोड़ पे गुज़री है मेरी ज़िन्दगी 'अल्ताफ़' जिस मोड़ पे पल भर कोई ठहरा नहीं करते
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वो जिस पर उस की रहमत हो वो दौलत माँगता है क्या मोहब्बत करने वाला दिल मोहब्बत माँगते है क्या तुम्हारा दिल कहे जब भी उजाला बन के आ जाना कभी उगता हुआ सूरज इजाज़त माँगता है क्या
Ankita Singh
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एक दिन की ख़ुराक है मेरी आप के हैं जो पूरे साल के दुख
Varun Anand
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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साथ चलते जा रहे हैं पास आ सकते नहीं इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं उस की भी मजबूरियाँ हैं मेरी भी मजबूरियाँ रोज़ मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं
Bashir Badr
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मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्किय्यत का दावा नइँ वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ
Ali Zaryoun
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पलकों पे कुछ चराग़-ए-तमन्ना लिए हुए आँखों को ख़्वाब-ए-सुबह दिखाता रहा हूँ मैं
Altaf Iqbal
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सानेहा ऐसा गुज़र जाए तो फिर शे'र कहें उन की सुरत जो नज़र आए तो फिर शे'र कहें बस यही शेवा हमारा है के हम अहले जूनू दर्द की हद से गुज़र जाए तो फिर शे'र कहें
Altaf Iqbal
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सफ़ीने को सुख़न के डूब जाने से बचा मौला के नाशायर यहाँ पर अब ग़ज़ल के शे'र कहते हैं
Altaf Iqbal
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ख़ुद अपनी ज़ात में महसूर हो गया हूँ मैं ये ज़ख़्म कौन सा है जिस में मुब्तिला हूँ मैं सज़ा है जब से मेरे सर पे ताज शोहरत का हर एक शख़्स की आँखों में खल रहा हूँ मैं
Altaf Iqbal
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वो जब जब भी लबे नाज़ुक से मेरा नाम लेते हैं तो पहले बढ़ के हम अपना कलेजा थाम लेते हैं
Altaf Iqbal
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