वो अपने ज़ेहन में रखती थी पहले मुझ को फिर वो मेरा नाम बनाती थी अपने हाथों पे
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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वो सदा जो कान तक पहुंँची नहीं शहर भर में ढूंँढते हैं हम उसे
Dipendra Singh 'Raaz'
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जल कर के राख हो गए हैं ख़्वाब सब मेरे आँखों में रतजगों के सिवा कुछ नहीं बचा
Dipendra Singh 'Raaz'
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तुम छोड़ गए तो मुझे एहसास हुआ ये हाथों की पकड़ मेरी ही मज़बूत नहीं थी
Dipendra Singh 'Raaz'
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जिन को पनाह नहीं मिलती है बाँहों में रक़्स किया करते हैं वो सहराओं में
Dipendra Singh 'Raaz'
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मैं कैसे चैन से सोऊँ यहाँ पर तेरी यादों से कमरा भर गया है
Dipendra Singh 'Raaz'
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