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यही ग़लती हमेशा हो रही है मुहब्बत एक तरफा हो रही है

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जबसे बोला उस ने हाए मुहब्बत से ली फिर दीवानों की राय मुहब्बत से आते देख छुपा करती थी जो लड़की उस ने आज पिलाई चाय मुहब्बत से

Rohit Gustakh

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क्या हुआ जो मुझे हम-उम्र मोहब्बत न मिली मेरी ख़्वाहिश भी यही थी कि बड़ी आग लगे

Muzdum Khan

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सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का

Shahryar

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ख़मोशी तो यही बतला रही है उदासी रास मुझ को आ रही है मुझे जिन ग़लतियों से सीखना था वही फिर ज़िंदगी दोहरा रही है

Vishal Singh Tabish

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जहान भर में न हो मुयस्सर जो कोई शाना, हमें बताना नहीं मिले गर कोई ठिकाना तो लौट आना, हमें बताना कुछ ऐसी बातें जो अनकही हों, मगर वो अंदर से खा रही हों लगे किसी को बताना है पर नहीं बताना, हमें बताना

Vikram Gaur Vairagi

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