ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है जैसे जंगल है रास्ता भी है यूँँ तो वादे हज़ार करता है और वो शख़्स भूलता भी है हम को हर सू नज़र भी रखनी है और तेरे पास बैठना भी है यूँँ भी आता नहीं मुझे रोना और मातम की इब्तिदा भी है चूमने हैं पसंद के बादल शाम होते ही लौटना भी है
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मेरा हाथ पकड़ ले पागल, जंगल है जितना भी रौशन हो जंगल, जंगल है
Umair Najmi
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लोग काँटों से बच के चलते हैं मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं
Unknown
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उलझ कर के तेरी ज़ुल्फ़ों में यूँँ आबाद हो जाऊँ कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊँ मैं यमुना की तरह तन्हा निहारूँ ताज को कब तक कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊँ
Ashraf Jahangeer
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मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में
Ammar Iqbal
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ज़ेहन से यादों के लश्कर जा चुके वो मेरी महफ़िल से उठ कर जा चुके मेरा दिल भी जैसे पाकिस्तान है सब हुकूमत कर के बाहर जा चुके
Tehzeeb Hafi
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वो मुझे ले गया गुलों के बीच और कहने लगा कि ऐसा बन
Karan Sahar
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कौन देता है सदा हम को घने जंगल में तू है या तेरा तसव्वुर है भरे जंगल में कोई मंज़िल है न रास्ता है न साया कोई मैं अकेला ही भटकता हूँ मेरे जंगल में
Karan Sahar
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तसव्वुर ने बनाया एक साया फिर असली धूप से उस ने बचाया तुझे इक ख़्वाब की मानिंद समझा तुझे दिन भर जिया शब भर सजाया
Karan Sahar
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महसूस कर रहा हूँ तेरा शुमार ख़ुद में सो झाँकने लगा हूँ मैं बार-बार ख़ुद में तेरी चमक से रौशन हर रहगुज़ार होगा इतना तो मेरे जुगनू रख ऐतिबार ख़ुद में
Karan Sahar
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न रोए तो बहुत आँसू गिरेंगे मुझे ही देख लो भीगा पड़ा हूँ
Karan Sahar
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