ज़िक्र जब भी हो गुनाहों का 'मनोहर' फ़ैसला तो फिर अदालत ही करेगी
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आप की आँखें अगर शे'र सुनाने लग जाएँ हम जो ग़ज़लें लिए फिरते हैं, ठिकाने लग जाएँ
Rehman Faris
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तू मिला ही नहीं मगर फिर भी है बिछड़ने का मुझ को डर फिर भी जानता हूँ तू आ नहीं सकता पर सजाया है मैं ने घर फिर भी
Sandeep Thakur
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चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है
Munawwar Rana
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दो जहाँ की ज़िंदगी जीकर चले हैं दो घड़ी मरते-मरते फिर मुझे कुछ और मरने दीजिए
nakul kumar
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इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए
Vipul Kumar
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सच बताओं मर्सिया-ख़्वानी किसे मालूम है आँख से बहता हुआ पानी किसे मालूम है
Manohar Shimpi
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याज़ कोई भी रहे दीवानगी भी चाहिए मसअले हालात वर्ना आज भी प्रतिकूल हैं
Manohar Shimpi
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ज़िक्र ज़ात-ओ-सिफ़ात भी होगा कोई फिर कुल्लियात भी होगा
Manohar Shimpi
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तुम वादियों को जन्नत-ए-कश्मीर ही कहते रहे फिर ख़ुशनुमा माहौल में ही लोग भी बसते रहे
Manohar Shimpi
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वक़्त आता और जाता है "मनोहर" फिर ग़म-ए-दिल और शिकवा क्यूँँ रहे है
Manohar Shimpi
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