ज़िंदगी तो ज़िंदगी इस मौत पर अब ख़ुदा से ही शिकायत हो रही लग गया हूँ काम पर जब से तिरे साथ रहमत और बरकत हो रही
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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अब उस की शादी का क़िस्सा न छेड़ो बस इतना कह दो कैसी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
Azm Shakri
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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का
Javed Akhtar
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गुलाब ख़्वाब दवा ज़हर जाम क्या क्या है मैं आ गया हूँ बता इंतिज़ाम क्या क्या है
Rahat Indori
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तुम्हारी याद क्या आई ज़रा सी चमक चेहरे पे फ़ौरन आ गई फिर
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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ज़िंदगी भी ख़त्म होती ही नहीं और ये उदासी जान लेने पर तुली है
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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कोई तो चाहता होगा हमें भी किसी के फोन में हम सेव होंगे
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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किसी भी वक़्त अब तो टूट सकती है तुम्हारी याद की ये अलगनी जानाँ
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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तुम्हारी याद क्या आई ज़रा सी चमक चेहरे पे फ़ौरन आ गई फिर
Yashvardhan Mishra 'Hind'
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