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हमें भी वक़्त ने पत्थर सिफ़त बना डाला हमीं थे मोम की सूरत पिघलने वाले लोग
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@iqbal-ashhar
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Nazm
हमें भी वक़्त ने पत्थर सिफ़त बना डाला हमीं थे मोम की सूरत पिघलने वाले लोग
आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई
वो किसी को याद कर के मुस्कुराया था उधर और मैं नादान ये समझा कि वो मेरा हुआ
वो जो ख़्वाब थे मेरे ज़ेहन में न मैं कह सका न मैं लिख सका कि ज़बाँ मिली तो कटी हुई जो क़लम मिला तो बिका हुआ
मुद्दतों ब'अद मुयस्सर हुआ माँ का आँचल मुद्दतों ब'अद हमें नींद सुहानी आई
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