Top 20 Sher Series

Shayari of Muzaffar Hanfi

Shayari of Muzaffar Hanfi ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Series se pehle kuch standout sher padhein.

रोती हुई एक भीड़ मिरे गिर्द खड़ी थी शायद ये तमाशा मिरे हँसने के लिए था

शुक्रिया रेशमी दिलासे का तीर तो आप ने भी मारा था

सुनाइए वो लतीफ़ा हर एक जाम के साथ कि एक बूँद से ईमान टूट जाता है

उगल देते हैं जो कुछ पेट में हो घर में आते ही परिंदे अपने बच्चों से अदाकारी नहीं करते

यूँ पलक पर जगमगाना दो घड़ी का ऐश है रौशनी बन कर मिरे अंदर ही अंदर फैल जा

देखना कैसे हुमकने लगे सारे पत्थर मेरी वहशत को तुम्हारी गली पहचानती है

ख़ुद ही न डूब जाऊँ कि फ़ुर्सत मिले मुझे नेकी लदी है पुश्त पे दरिया है सामने

अब 'उम्र का एहसास दिलाने लगे जुगनू दामन से मिरी आँख में आने लगे जुगनू

यहाँ 'अदू के सिवा कौन पूछता है हमें लहू-लुहान सही कुछ नहीं हुआ है हमें

फ़ाख़्ता कहती रही फ़स्लें जला दी जाएँगी झूम कर आगे बढ़े बादल कि हम तो जाएँगे

अभी तो मैं दो क़दम चला हूँ ज़मीन क्यों तंग हो रही है मुझी पे क्यों आसमान टूटे अभी तो मैं पर निकालता था

सूरज को तोड़-मोड़ के जब दिन किया तमाम तारों के टूटने से शब-ए-तार हिल गई

उस वक़्त जब तिलिस्म-ए-फ़लक टूटने को था ऐसा हुआ कि मुझ को बुलाने लगी ज़मीं

ड्योढ़ी में आ गया था कि बारिश ज़रा थमे ज़ंजीर-ए-दर तो यूँ ही मिरे यार हिल गई

रोती हुई एक भीड़ मिरे गिर्द खड़ी थी शायद ये तमाशा मिरे हँसने के लिए था

शुक्रिया रेशमी दिलासे का तीर तो आप ने भी मारा था

सुनाइए वो लतीफ़ा हर एक जाम के साथ कि एक बूँद से ईमान टूट जाता है

उगल देते हैं जो कुछ पेट में हो घर में आते ही परिंदे अपने बच्चों से अदाकारी नहीं करते

यूँ पलक पर जगमगाना दो घड़ी का ऐश है रौशनी बन कर मिरे अंदर ही अंदर फैल जा

देखना कैसे हुमकने लगे सारे पत्थर मेरी वहशत को तुम्हारी गली पहचानती है

ख़ुद ही न डूब जाऊँ कि फ़ुर्सत मिले मुझे नेकी लदी है पुश्त पे दरिया है सामने

अब 'उम्र का एहसास दिलाने लगे जुगनू दामन से मिरी आँख में आने लगे जुगनू

यहाँ 'अदू के सिवा कौन पूछता है हमें लहू-लुहान सही कुछ नहीं हुआ है हमें

फ़ाख़्ता कहती रही फ़स्लें जला दी जाएँगी झूम कर आगे बढ़े बादल कि हम तो जाएँगे

अभी तो मैं दो क़दम चला हूँ ज़मीन क्यों तंग हो रही है मुझी पे क्यों आसमान टूटे अभी तो मैं पर निकालता था

सूरज को तोड़-मोड़ के जब दिन किया तमाम तारों के टूटने से शब-ए-तार हिल गई

उस वक़्त जब तिलिस्म-ए-फ़लक टूटने को था ऐसा हुआ कि मुझ को बुलाने लगी ज़मीं

ड्योढ़ी में आ गया था कि बारिश ज़रा थमे ज़ंजीर-ए-दर तो यूँ ही मिरे यार हिल गई

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Shayari of Muzaffar Hanfi FAQs

Muzaffar Hanfi Top 20 me kya milega?

Muzaffar Hanfi ke selected sher readable cards, internal detail links, aur writer discovery ke saath milenge.

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Haan, collection links, writer links aur detail links sab Kuch Alfaaz ke internal routes par map kiye gaye hain.

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