Top 20 Sher Series

Shayari of Sarwat Husain

Shayari of Sarwat Husain ek clean reading flow me, writer aur full-detail links ke saath.

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Series se pehle kuch standout sher padhein.

मौत के दरिंदे में इक कशिश तो है 'सरवत' लोग कुछ भी कहते हों ख़ुद-कुशी के बारे में

भर जाएँगे जब ज़ख़्म तो आऊँगा दोबारा मैं हार गया जंग मगर दिल नहीं हारा

मिलना और बिछड़ जाना किसी रस्ते पर इक यही क़िस्सा आदमियों के साथ रहा

सोचता हूँ कि उस से बच निकलूँ बच निकलने के ब'अद क्या होगा

'सरवत' तुम अपने लोगों से यूँ मिलते हो जैसे उन लोगों से मिलना फिर नहीं होगा

ख़ुश-लिबासी है बड़ी चीज़ मगर क्या कीजे काम इस पल है तिरे जिस्म की उर्यानी से

शहज़ादी तुझे कौन बताए तेरे चराग़-कदे तक कितनी मेहराबें पड़ती हैं कितने दर आते हैं

मैं आग देखता था आग से जुदा कर के बला का रंग था रंगीनी-ए-क़बा से उधर

मैं किताब-ए-ख़ाक खोलूँ तो खुले क्या नहीं मौजूद क्या मौजूद है

मिरे सीने में दिल है या कोई शहज़ादा-ए-ख़ुद-सर किसी दिन उस को ताज-ओ-तख़्त से महरूम कर देखूँ

कभी तेग़-ए-तेज़ सुपुर्द की कभी तोहफ़ा-ए-गुल-ए-तर दिया किसी शाह-ज़ादी के इश्क़ ने मिरा दिल सितारों से भर दिया

मैं अपनी प्यास के हमराह मश्कीज़ा उठाए कि इन सैराब लोगों में कोई प्यासा मिलेगा

साया-ए-अब्र से पूछो 'सरवत' अपने हमराह अगर ले जाए

सियाही फेरती जाती हैं रातें बहर ओ बर पे इन्ही तारीकियों से मुझ को भी हिस्सा मिलेगा

मौत के दरिंदे में इक कशिश तो है 'सरवत' लोग कुछ भी कहते हों ख़ुद-कुशी के बारे में

भर जाएँगे जब ज़ख़्म तो आऊँगा दोबारा मैं हार गया जंग मगर दिल नहीं हारा

मिलना और बिछड़ जाना किसी रस्ते पर इक यही क़िस्सा आदमियों के साथ रहा

सोचता हूँ कि उस से बच निकलूँ बच निकलने के ब'अद क्या होगा

'सरवत' तुम अपने लोगों से यूँ मिलते हो जैसे उन लोगों से मिलना फिर नहीं होगा

ख़ुश-लिबासी है बड़ी चीज़ मगर क्या कीजे काम इस पल है तिरे जिस्म की उर्यानी से

शहज़ादी तुझे कौन बताए तेरे चराग़-कदे तक कितनी मेहराबें पड़ती हैं कितने दर आते हैं

मैं आग देखता था आग से जुदा कर के बला का रंग था रंगीनी-ए-क़बा से उधर

मैं किताब-ए-ख़ाक खोलूँ तो खुले क्या नहीं मौजूद क्या मौजूद है

मिरे सीने में दिल है या कोई शहज़ादा-ए-ख़ुद-सर किसी दिन उस को ताज-ओ-तख़्त से महरूम कर देखूँ

कभी तेग़-ए-तेज़ सुपुर्द की कभी तोहफ़ा-ए-गुल-ए-तर दिया किसी शाह-ज़ादी के इश्क़ ने मिरा दिल सितारों से भर दिया

मैं अपनी प्यास के हमराह मश्कीज़ा उठाए कि इन सैराब लोगों में कोई प्यासा मिलेगा

साया-ए-अब्र से पूछो 'सरवत' अपने हमराह अगर ले जाए

सियाही फेरती जाती हैं रातें बहर ओ बर पे इन्ही तारीकियों से मुझ को भी हिस्सा मिलेगा

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Shayari of Sarwat Husain FAQs

Sarvat Husain Top 20 me kya milega?

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