ghazalKuch Alfaaz

आबरू-ए-शब-ए-तीरा नहीं रखने वाले हम कहीं पर भी अँधेरा नहीं रखने वाले आइना रखने का इल्ज़ाम भी आया हम पर जब कि हम लोग तो चेहरा नहीं रखने वाले हम पे फ़रहाद का कुछ क़र्ज़ निकलता है सो हम तुम कहो भी तो ये तेशा नहीं रखने वाले हम को मालूम हैं अज़-रु-ए-मोहब्बत सो हम कोई भी दर्द ज़ियादा नहीं रखने वाले

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का क़रीब आए तो देखेंगे हौसला शब का चली तो आई थी कुछ दूर साथ साथ मिरे फिर इस के बा'द ख़ुदा जाने क्या हुआ शब का मिरे ख़याल के वहशत-कदे में आते ही जुनूँ की नोक से फूटा है आबला शब का सहर की पहली किरन ने उसे बिखेर दिया मुझे समेटने आया था जब ख़ुदा शब का ज़मीं पे आ के सितारों ने ये कहा मुझ से तिरे क़रीब से गुज़रा है क़ाफ़िला शब का सहर का लम्स मिरी ज़िंदगी बढ़ा देता मगर गराँ था बहुत मुझ पे काटना शब का कभी कभी तो ये वहशत भी हम पे गुज़री है कि दिल के साथ ही देखा है डूबना शब का चटख़ उठी है रग-ए-जाँ तो ये ख़याल आया किसी की याद से जुड़ता है सिलसिला शब का

Abhishek shukla

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तुझ सेे वाबस्ता कोई ग़म नहीं रखने वाले जिस को रखना हो रक्खे हम नहीं रखने वाले अपने उलझे हुए बालों की क़सम हम इस बार तेरी ज़ुल्फ़ों में कोई ख़म नहीं रखने वाले एक हव्वा की मुहब्बत के सिवा सीने में और कुछ हज़रत-ए-अदम नहीं रखने वाले

Abhishek shukla

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अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है मैं और मेरी तरह तू भी एक हक़ीक़त है फिर इस के बा'द जो बचता है वो कहानी है तेरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं तेरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है ज़रा भी दख़्ल नहीं इस में इन हवाओं का हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है ये ख़्वाब-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम हर एक चीज़ मेरी ज़ात में पुरानी है वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की वो एक फूल की लगता है रात-रानी है इरादतन तो कहीं कुछ नहीं हुआ लेकिन मैं जी रहा हूँ ये साँसों की ख़ुश-गुमानी है

Abhishek shukla

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फ़सील-ए-जिस्म गिरा दे मकान-ए-जाँ से निकल ये इंतिशार-ज़दा शहर है यहाँ से निकल तिरी तलाश में फिरते हैं आफ़्ताब कई सो अब ये फ़र्ज़ है तुझ पर कि साएबाँ से निकल तमाम शहर पे इक ख़ामुशी मुसल्लत है अब ऐसा कर कि किसी दिन मिरी ज़बाँ से निकल मक़ाम-ए-वस्ल तो अर्ज़-ओ-समा के बीच में है मैं इस ज़मीन से निकलूँ तू आसमाँ से निकल मैं अपनी ज़ात में तारीकियाँ समेटे हूँ तू इक चराग़ जला और अब यहाँ से निकल कहा था मुझ से भी इक दिन हवा-ए-सहरा ने मिरी पनाह में आ जा ग़ुबार-ए-जाँ से निकल

Abhishek shukla

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दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें फिर उस के बा'द तुझे सोचें ये ग़ज़ब भी करें वो जिस ने शाम के माथे पे हाथ फेरा है हम उस चराग़-ए-हवा-साज़ का अदब भी करें सियाहियाँ सी बिखरने लगी हैं सीने में अब उस सितारा-ए-शब-ताब की तलब भी करें ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में वही दुआ जो नज़र कर रही है लब भी करें कि जैसे ख़्वाब दिखाना तसल्लियाँ देना कुछ एक काम मोहब्बत में बे-सबब भी करें मैं जानता हूँ कि ता'बीर ही नहीं मुमकिन वो मेरे ख़्वाब की तशरीह चाहे जब भी करें शिकस्त-ए-ख़्वाब की मंज़िल भी कब नई है हमें वही जो करते चले आएँ हैं सो अब भी करें

Abhishek shukla

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