aae kuchh abr kuchh sharab aae is ke baad aae jo azaab aae bam-e-mina se mahtab utre dast-e-saqi men aftab aae har rag-e-khun men phir charaghhan ho samne phir vo be-naqab aae umr ke har varaq pe dil ki nazar teri mehr-o-vafa ke baab aae kar raha tha ghham-e-jahan ka hisab aaj tum yaad be-hisab aae na gai tere ghham ki sardari dil men yuun roz inqalab aae jal uthe bazm-e-ghhair ke dar-o-bam jab bhi ham khanuman-kharab aae is tarah apni khamushi gunji goya har samt se javab aae 'faiz' thi raah sar-ba-sar manzil ham jahan pahunche kamyab aae aae kuchh abr kuchh sharab aae is ke baad aae jo azab aae baam-e-mina se mahtab utre dast-e-saqi mein aaftab aae har rag-e-khun mein phir charaghan ho samne phir wo be-naqab aae umr ke har waraq pe dil ki nazar teri mehr-o-wafa ke bab aae kar raha tha gham-e-jahan ka hisab aaj tum yaad be-hisab aae na gai tere gham ki sardari dil mein yun roz inqalab aae jal uthe bazm-e-ghair ke dar-o-baam jab bhi hum khanuman-kharab aae is tarah apni khamushi gunji goya har samt se jawab aae 'faiz' thi rah sar-ba-sar manzil hum jahan pahunche kaamyab aae
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई
Jaun Elia
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गर्मी-ऐ-शौक़-ऐ-नज़ारा का असर तो देखो गुल खिले जाते हैं वो साया-ए-तर तो देखो ऐसे नादाँ भी न थे जाँ से गुज़रने वाले नासेहो पंद-गरो राह-गुज़र तो देखो वो तो वो है तुम्हें हो जाएगी उल्फ़त मुझ से इक नज़र तुम मिरा महबूब-ए-नज़र तो देखो वो जो अब चाक गरेबाँ भी नहीं करते हैं देखने वालो कभी उन का जिगर तो देखो दामन-ए-दर्द को गुलज़ार बना रक्खा है आओ इक दिन दिल-ए-पुर-ख़ूँ का हुनर तो देखो सुब्ह की तरह झमकता है शब-ए-ग़म का उफ़ुक़ 'फ़ैज़' ताबिंदगी-ए-दीदा-ए-तर तो देखो
Faiz Ahmad Faiz
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बात बस से निकल चली है दिल की हालत सँभल चली है अब जुनूँ हद से बढ़ चला है अब तबीअ'त बहल चली है अश्क ख़ूनाब हो चले हैं ग़म की रंगत बदल चली है या यूँँही बुझ रही हैं शमएँ या शब-ए-हिज्र टल चली है लाख पैग़ाम हो गए हैं जब सबा एक पल चली है जाओ अब सो रहो सितारो दर्द की रात ढल चली है
Faiz Ahmad Faiz
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दरबार में अब सतवत-ए-शाही की अलामत दरबाँ का असा है कि मुसन्निफ़ का क़लम है आवारा है फिर कोह-ए-निदा पर जो बशारत तम्हीद-ए-मसर्रत है कि तूल-ए-शब-ए-ग़म है जिस धज्जी को गलियों में लिए फिरते हैं तिफ़्लाँ ये मेरा गरेबाँ है कि लश्कर का अलम है जिस नूर से है शहर की दीवार दरख़्शाँ ये ख़ून-ए-शहीदाँ है कि ज़र-ख़ाना-ए-जम है हल्क़ा किए बैठे रहो इक शम्अ' को यारो कुछ रौशनी बाक़ी तो है हर-चंद कि कम है
Faiz Ahmad Faiz
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हर हक़ीक़त मजाज़ हो जाए काफ़िरों की नमाज़ हो जाए दिल रहीन-ए-नियाज़ हो जाए बेकसी कारसाज़ हो जाए मिन्नत-ए-चारा-साज़ कौन करे दर्द जब जाँ-नवाज़ हो जाए इश्क़ दिल में रहे तो रुस्वा हो लब पे आए तो राज़ हो जाए लुत्फ़ का इंतिज़ार करता हूँ जौर ता हद्द-ए-नाज़ हो जाए उम्र बे-सूद कट रही है 'फ़ैज़' काश इफ़शा-ए-राज़ हो जाए
Faiz Ahmad Faiz
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रंग पैराहन का ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम मौसम-ए-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम दोस्तो उस चश्म ओ लब की कुछ कहो जिस के बग़ैर गुलसिताँ की बात रंगीं है न मय-ख़ाने का नाम फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम दिलबरी ठहरा ज़बान-ए-ख़ल्क़ खुलवाने का नाम अब नहीं लेते परी-रू ज़ुल्फ़ बिखराने का नाम अब किसी लैला को भी इक़रार-ए-महबूबी नहीं इन दिनों बदनाम है हर एक दीवाने का नाम मोहतसिब की ख़ैर ऊँचा है उसी के फ़ैज़ से रिंद का साक़ी का मय का ख़ुम का पैमाने का नाम हम से कहते हैं चमन वाले ग़रीबान-ए-चमन तुम कोई अच्छा सा रख लो अपने वीराने का नाम 'फ़ैज़' उन को है तक़ाज़ा-ए-वफ़ा हम से जिन्हें आश्ना के नाम से प्यारा है बेगाने का नाम
Faiz Ahmad Faiz
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