अब जो इक हसरत-ए-जवानी है उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है रश्क-ए-यूसुफ़ है आह वक़्त-ए-अज़ीज़ उम्र इक बार-ए-कारवानी है गिर्या हर वक़्त का नहीं बे-हेच दिल में कोई ग़म-ए-निहानी है हम क़फ़स-ज़ाद क़ैदी हैं वर्ना ता चमन एक पर-फ़िशानी है उस की शमशीर तेज़ है हमदम मर रहेंगे जो ज़िंदगानी है ग़म-ओ-रंज-ओ-अलम निको याँ से सब तुम्हारी ही मेहरबानी है ख़ाक थी मौजज़न जहाँ में और हम को धोका ये था कि पानी है याँ हुए 'मीर' तुम बराबर ख़ाक वाँ वही नाज़ ओ सरगिरानी है
Related Ghazal
तुम्हारा क्या है तुम्हें सिर्फ़ ज्ञान देना है हमारी सोचो हमें इम्तिहान देना है गुलाब भी हैं गुलाबों में ख़ार भी हैं बता निशानी देनी है या फिर निशान देना है तेरा सवाल मेरी जान का सवाल है और जवाब देने से आसान जान देना है उन्होंने अपने मुताबिक़ सज़ा सुना दी है हमें सज़ा के मुताबिक़ बयान देना है ये बेज़ुबानों की महफ़िल है दोस्त याद रहे यहाँ ख़मोशी का मतलब ज़बान देना है
Charagh Sharma
39 likes
ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बे-ख़बर नहीं अब तो ख़ुद अपने ख़ून ने भी साफ़ कह दिया मैं आप का रहूँगा मगर उम्र भर नहीं आ ही गए हैं ख़्वाब तो फिर जाएँगे कहाँ आँखों से आगे उन की कोई रहगुज़र नहीं कितना जिएँ कहाँ से जिएँ और किस लिए ये इख़्तियार हम पे है तक़दीर पर नहीं माज़ी की राख उलटीं तो चिंगारियाँ मिलीं बे-शक किसी को चाहो मगर इस क़दर नहीं
Aalok Shrivastav
14 likes
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
107 likes
मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमासान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिस की बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा'-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तर्बियत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है
Abbas Qamar
12 likes
मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की दाद लोगों की गला अपना ग़ज़ल उस्ताद की अपनी साँसें बेच कर मैं ने जिसे आबाद की वो गली जन्नत तो अब भी है मगर शद्दाद की उम्र भर चलते रहे आँखों पे पट्टी बाँध कर ज़िंदगी को ढूँडने में ज़िंदगी बर्बाद की दास्तानों के सभी किरदार कम होने लगे आज काग़ज़ चुनती फिरती है परी बग़दाद की इक सुलगता चीख़ता माहौल है और कुछ नहीं बात करते हो 'यगाना' किस अमीनाबाद की
Rahat Indori
18 likes
More from Meer Taqi Meer
मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ
Meer Taqi Meer
0 likes
कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था शाम से ता सुब्ह दम-ए-बालीं पे सर यकजा न था शोहरा-ए-आलम उसे युम्न-ए-मोहब्बत ने किया वर्ना मजनूँ एक ख़ाक उफ़्तादा-ए-वीराना था मंज़िल उस मह की रहा जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था इक निगाह-ए-आश्ना को भी वफ़ा करता नहीं वा हुईं मिज़्गाँ कि सब्ज़ा सब्ज़ा-ए-बेगाना था रोज़ ओ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे ऐ दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था याद अय्या में कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था जिस को देखा हम ने इस वहशत-कदे में दहर के या सिड़ी या ख़ब्ती या मजनून या दीवाना था बा'द ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था ग़ैर के कहने से मारा उन ने हम को बे-गुनाह ये न समझा वो कि वाक़े में भी कुछ था या न था सुब्ह होते वो बिना-गोश आज याद आया मुझे जो गिरा दामन पे आँसू गौहर-ए-यक-दाना था शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त शम्अ'' का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था रात उस की चश्म-ए-मयगूँ ख़्वाब में देखी थी मैं सुब्ह सोते से उठा तो सामने पैमाना था रहम कुछ पैदा किया शायद कि उस बे-रहम ने गोश उस का शब इधर ता आख़िर-ए-अफ़्साना था 'मीर' भी क्या मस्त ताफ़ेह था शराब-ए-इश्क़ का लब पे आशिक़ के हमेशा नारा-ए-मस्ताना था
Meer Taqi Meer
0 likes
शिकवा करूँँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का अल-क़िस्सा रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन हुआ है जाँ का गिर्ये पे रंग आया क़ैद-ए-क़फ़स से शायद ख़ूँ हो गया जिगर में अब दाग़ गुल्सिताँ का ले झाड़ू टोकरा ही आता है सुब्ह होते जारूब-कश मगर है ख़ुर्शीद उस के हाँ का दी आग रंग-ए-गुल ने वाँ ऐ सबा चमन को याँ हम जले क़फ़स में सुन हाल आशियाँ का हर सुब्ह मेरे सर पर इक हादिसा नया है पैवंद हो ज़मीं का शेवा इस आसमाँ का इन सैद-अफ़गनों का क्या हो शिकार कोई होता नहीं है आख़िर काम उन के इम्तिहाँ का तब तो मुझे किया था तीरों से सैद अपना अब करते हैं निशाना हर मेरे उस्तुख़्वाँ का फ़ितराक जिस का अक्सर लोहू में तर रहे है वो क़स्द कब करे है इस सैद-ए-नातवाँ का कम-फ़ुर्सती जहाँ के मज में' की कुछ न पूछो अहवाल क्या कहूँ मैं इस मजलिस-ए-रवाँ का सज्दा करें हैं सुन कर औबाश सारे उस को सय्यद पिसर वो प्यारा हैगा इमाम बाँका ना-हक़ शनासी है ये ज़ाहिद न कर बराबर ताअ'त से सौ बरस की सज्दा उस आस्ताँ का हैं दश्त अब ये जीते बस्ते थे शहर सारे वीरान-ए-कुहन है मामूरा इस जहाँ का जिस दिन कि उस के मुँह से बुर्क़ा उठेगा सुनियो उस रोज़ से जहाँ में ख़ुर्शीद फिर न झाँका ना-हक़ ये ज़ुल्म करना इंसाफ़ कह पियारे है कौन सी जगह का किस शहर का कहाँ का सौदाई हो तो रक्खे बाज़ार-ए-इश्क़ में पा सर मुफ़्त बेचते हैं ये कुछ चलन है वाँ का सौ गाली एक चश्मक इतना सुलूक तो है औबाश ख़ाना जंग उस ख़ुश-चश्म बद-ज़बाँ का या रोए या रुलाया अपनी तो यूँँ ही गुज़री क्या ज़िक्र हम-सफ़ीराँ यारान-ए-शादमाँ का क़ैद-ए-क़फ़स में हैं तो ख़िदमत है नालगी की गुलशन में थे तो हम को मंसब था रौज़ा-ख़्वाँ का पूछो तो 'मीर' से क्या कोई नज़र पड़ा है चेहरा उतर रहा है कुछ आज उस जवाँ का
Meer Taqi Meer
0 likes
ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
0 likes
महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
Meer Taqi Meer
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Meer Taqi Meer.
Similar Moods
More moods that pair well with Meer Taqi Meer's ghazal.







