ghazalKuch Alfaaz

अब मंज़िल-ए-सदास सफ़र कर रहे हैं हम या'नी दिल-ए-सुकूत में घर कर रहे हैं हम खोया है कुछ ज़रूर जो उस की तलाश में हर चीज़ को इधर से उधर कर रहे हैं हम गोया ज़मीन कम थी तग-ओ-ताज़ के लिए पैमाइश-ए-नुजूम-ओ-क़मर कर रहे हैं हम काफ़ी न था जमाल-ए-रुख़-ए-सादा-ए-बहार ज़ेबाइश-ए-गियाह-ओ-शजर कर रहे हैं हम

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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मुझ में कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या बंद एक मुद्दत से हूँ खुल जाऊँ क्या आजिज़ी मिन्नत ख़ुशामद इल्तिजा और मैं क्या क्या करूँँ मर जाऊँ क्या तेरे जलसे में तेरा परचम लिए सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊँ क्या कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या एक पत्थर है वो मेरी राह का गर न ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या फिर जगाया तू ने सोए शे'र को फिर वही लहजा दराज़ी आऊँ क्या

Rahat Indori

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को

Ahmad Mushtaq

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अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए इश्क़-ओ-हवस हैं सब फ़रेब आप से क्या छुपाइए उस ने कहा कि याद हैं रंग तुलू-ए-इश्क़ के मैं ने कहा कि छोड़िए अब उन्हें भूल जाइए कैसे नफ़ीस थे मकाँ साफ़ था कितना आसमाँ मैं ने कहा कि वो समाँ आज कहाँ से लाइए कुछ तो सुराग़ मिल सके मौसम-ए-दर्द-ए-हिज्र का संग-ए-जमाल-ए-यार पर नक़्श कोई बनाइए कोई शरर नहीं बचा पिछले बरस की राख में हम-नफ़्सान-ए-शो'ला-ख़ू आग नई जलाइए

Ahmad Mushtaq

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चाँद उस घर के दरीचों के बराबर आया दिल-ए-मुश्ताक़ ठहर जा वही मंज़र आया मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में क्यूँँ तिरी याद का बादल मिरे सर पर आया बुझ गई रौनक़-ए-परवाना तो महफ़िल चमकी सो गए अहल-ए-तमन्ना तो सितमगर आया यार सब जम्अ' हुए रात की ख़ामोशी में कोई रो कर तो कोई बाल बना कर आया

Ahmad Mushtaq

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किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता इक ख़्वाब-ए-मोहब्बत है कि बूढ़ा नहीं होता वो वक़्त भी आता है जब आँखों में हमारी फिरती हैं वो शक्लें जिन्हें देखा नहीं होता बारिश वो बरसती है कि भर जाते हैं जल-थल देखो तो कहीं अब्र का टुकड़ा नहीं होता घिर जाता है दिल दर्द की हर बंद गली में चाहो कि निकल जाएँ तो रस्ता नहीं होता यादों पे भी जम जाती है जब गर्द-ए-ज़माना मिलता है वो पैग़ाम कि पहुँचा नहीं होता तन्हाई में करनी तो है इक बात किसी से लेकिन वो किसी वक़्त अकेला नहीं होता क्या उस से गिला कीजिए बर्बादी-ए-दिल का हम से भी तो इज़्हार-ए-तमन्ना नहीं होता

Ahmad Mushtaq

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शाम होती है तो याद आती है सारी बातें वो दोपहरों की ख़मोशी वो हमारी बातें आँखें खोलूँ तो दिखाई नहीं देता कोई बंद करता हूँ तो हो जाती हैं जारी बातें कभी इक हर्फ़ निकलता नहीं मुँह से मेरे कभी इक साँस में कर जाता हूँ सारी बातें जाने किस ख़ाक में पोशीदा हैं आँसू मेरे किन फ़ज़ाओं में मुअ'ल्लक़ हैं तुम्हारी बातें किस मुलाक़ात की उम्मीद लिए बैठा हूँ मैं ने किस दिन पे उठा रक्खी हैं सारी बातें

Ahmad Mushtaq

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