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अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता कोई फ़ित्ना ता-क़यामत न फिर आश्कार होता तिरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ए'तिबार होता ग़म-ए-इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते ये वो ज़हर है कि आख़िर मय-ए-ख़ुश-गवार होता ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता तिरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते अगर अपनी ज़िंदगी का हमें ए'तिबार होता ये वो दर्द-ए-दिल नहीं है कि हो चारासाज़ कोई अगर एक बार मिटता तो हज़ार बार होता गए होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्म-ए-मस्त देखी मुझे क्या उलट न देते जो न बादा-ख़्वार होता मुझे मानते सब ऐसा कि अदू भी सज्दे करते दर-ए-यार का'बा बनता जो मिरा मज़ार होता तुम्हें नाज़ हो न क्यूँँकर कि लिया है 'दाग़' का दिल ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ़्तिख़ार होता

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Dagh Dehlvi

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रंज की जब गुफ़्तुगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी चाहिए पैग़ाम-बर दोनों तरफ़ लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी मेरी रुस्वाई की नौबत आ गई उन की शोहरत कू-ब-कू होने लगी है तिरी तस्वीर कितनी बे-हिजाब हर किसी के रू-ब-रू होने लगी ग़ैर के होते भला ऐ शाम-ए-वस्ल क्यूँँ हमारे रू-ब-रू होने लगी ना-उम्मीदी बढ़ गई है इस क़दर आरज़ू की आरज़ू होने लगी अब के मिल कर देखिए क्या रंग हो फिर हमारी जुस्तुजू होने लगी 'दाग़' इतराए हुए फिरते हैं आज शायद उन की आबरू होने लगी

Dagh Dehlvi

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सबक़ ऐसा पढ़ा दिया तू ने दिल से सब कुछ भला दिया तू ने हम निकम्में हुए ज़माने के काम ऐसा सिखा दिया तू ने कुछ तअ'ल्लुक़ रहा न दुनिया से शग़्ल ऐसा बता दिया तू ने किस ख़ुशी की ख़बर सुना के मुझे ग़म का पुतला बना दिया तू ने क्या बताऊँ कि क्या लिया मैं ने क्या कहूँ मैं की क्या दिया तू ने बे-तलब जो मिला मिला मुझ को बे-ग़रज़ जो दिया दिया तू ने उम्र-ए-जावेद ख़िज़्र को बख़्शी आब-ए-हैवाँ पिला दिया तू ने नार-ए-नमरूद को किया गुलज़ार दोस्त को यूँँ बचा दिया तू ने दस्त-ए-मूसा में फ़ैज़ बख़्शिश है नूर-ओ-लौह-ओ-असा दिया तू ने सुब्ह मौज नसीम गुलशन को नफ़स-ए-जाँ-फ़ज़ा दिया तू ने शब-ए-तीरा में शम्अ'' रौशन को नूर ख़ुर्शीद का दिया तू ने नग़्मा बुलबुल को रंग-ओ-बू गुल को दिल-कश-ओ-ख़ुशनुमा दिया तू ने कहीं मुश्ताक़ से हिजाब हुआ कहीं पर्दा उठा दिया तू ने था मिरा मुँह न क़ाबिल-ए-लब्बैक का'बा मुझ को दिखा दिया तू ने जिस क़दर मैं ने तुझ से ख़्वाहिश की इस से मुझ को सिवा दिया तू ने रहबर-ए-ख़िज़्र-ओ-हादी-ए-इल्यास मुझ को वो रहनुमा दिया तू ने मिट गए दिल से नक़्श-ए-बातिल सब नक़्शा अपना जमा दिया तू ने है यही राह मंज़िल-ए-मक़्सूद ख़ूब रस्ते लगा दिया तू ने मुझ गुनहगार को जो बख़्श दिया तो जहन्नुम को क्या दिया तू ने 'दाग़' को कौन देने वाला था जो दिया ऐ ख़ुदा दिया तू ने

Dagh Dehlvi

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भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं किसी से आज बिगड़ी है कि वो यूँँ बन के बैठे हैं दिलों पर सैकड़ों सिक्के तिरे जोबन के बैठे हैं कलेजों पर हज़ारों तीर इस चितवन के बैठे हैं इलाही क्यूँँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ अभी फिर रूठ जाएँगे अभी तो मन के बैठे हैं असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं सुबुक हो जाएँगे गर जाएँगे वो बज़्म-ए-दुश्मन में कि जब तक घर में बैठे हैं वो लाखों मन के बैठे हैं फ़ुसूँ है या दुआ है या मुअ'म्मा खुल नहीं सकता वो कुछ पढ़ते हुए आगे मिरे मदफ़न के बैठे हैं बहुत रोया हूँ मैं जब से ये मैं ने ख़्वाब देखा है कि आप आँसू बहाते सामने दुश्मन के बैठे हैं खड़े हों ज़ेर-ए-तूबा वो न दम लेने को दम भर भी जो हसरत-मंद तेरे साया-ए-दामन के बैठे हैं तलाश-ए-मंज़िल-ए-मक़्सद की गर्दिश उठ नहीं सकती कमर खोले हुए रस्ते में हम रहज़न के बैठे हैं ये जोश-ए-गिर्या तो देखो कि जब फ़ुर्क़त में रोया हूँ दर ओ दीवार इक पल में मिरे मदफ़न के बैठे हैं निगाह-ए-शोख़ ओ चश्म-ए-शौक़ में दर-पर्दा छनती है कि वो चिलमन में हैं नज़दीक हम चिलमन के बैठे हैं ये उठना बैठना महफ़िल में उन का रंग लाएगा क़यामत बन के उट्ठेंगे भबूका बन के बैठे हैं किसी की शामत आएगी किसी की जान जाएगी किसी की ताक में वो बाम पर बन-ठन के बैठे हैं क़सम दे कर उन्हें ये पूछ लो तुम रंग-ढंग उस के तुम्हारी बज़्म में कुछ दोस्त भी दुश्मन के बैठे हैं कोई छींटा पड़े तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ अज़ीमाबाद में हम मुंतज़िर सावन के बैठे हैं

Dagh Dehlvi

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जो हो सकता है उस से वो किसी से हो नहीं सकता मगर देखो तो फिर कुछ आदमी से हो नहीं सकता मोहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता मिरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नहीं सकता अलग करना रक़ीबों का इलाही तुझ को आसाँ है मुझे मुश्किल कि मेरी बेकसी से हो नहीं सकता किया है वादा-ए-फ़र्दा उन्हों ने देखिए क्या हो यहाँ सब्र ओ तहम्मुल आज ही से हो नहीं सकता ये मुश्ताक़-ए-शहादत किस जगह जाएँ किसे ढूँडें कि तेरा काम क़ातिल जब तुझी से हो नहीं सकता लगा कर तेग़ क़िस्सा पाक कीजिए दाद-ख़्वाहों का किसी का फ़ैसला कर मुंसिफ़ी से हो नहीं सकता मिरा दुश्मन ब-ज़ाहिर चार दिन को दोस्त है तेरा किसी का हो रहे ये हर किसी से हो नहीं सकता पुर्सिश कहोगे क्या वहाँ जब याँ ये सूरत है अदा इक हर्फ़-ए-वादा नाज़ुकी से हो नहीं सकता न कहिए गो कि हाल-ए-दिल मगर रंग-आश्ना हैं हम ये ज़ाहिर आप की क्या ख़ामुशी से हो नहीं सकता किया जो हम ने ज़ालिम क्या करेगा ग़ैर मुँह क्या है करे तो सब्र ऐसा आदमी से हो नहीं सकता चमन में नाज़ बुलबुल ने किया जो अपनी नाले पर चटक कर ग़ुंचा बोला क्या किसी से हो नहीं सकता नहीं गर तुझ पे क़ाबू दिल है पर कुछ ज़ोर हो अपना करूँँ क्या ये भी तो ना-ताक़ती से हो नहीं सकता न रोना है तरीक़े का न हँसना है सलीक़े का परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता हुआ हूँ इस क़दर महजूब अर्ज़-ए-मुद्दआ कर के कि अब तो उज़्र भी शर्मिंदगी से हो नहीं सकता ग़ज़ब में जान है क्या कीजे बदला रंज-ए-फ़ुर्क़त का बदी से कर नहीं सकते ख़ुशी से हो नहीं सकता मज़ा जो इज़्तिराब-ए-शौक़ से आशिक़ को है हासिल वो तस्लीम ओ रज़ा ओ बंदगी से हो नहीं सकता ख़ुदा जब दोस्त है ऐ 'दाग़' क्या दुश्मन से अंदेशा हमारा कुछ किसी की दुश्मनी से हो नहीं सकता

Dagh Dehlvi

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