ajiib thi vo ajab tarah chahta tha main vo baat karti thi aur khvab dekhta tha main visal ka ho ki us ke firaq ka mausam vo lazzaten thiin ki andar se tutta tha main chadha hua tha vo nashsha ki kam na hota tha hazar baar ubharta tha dubta tha main badan ka khel thiin us ki mohabbaten lekin jo bhed jism ke the jaan se kholta tha main phir is tarah kabhi soya na is tarah jaaga ki ruuh niind men thi aur jagta tha main kahan shikast hui aur kahan sila paaya kisi ka ishq kisi se nibahta tha main main ahl-e-zar ke muqabil men tha faqat shaer magar main jiit gaya lafz harta tha main ajib thi wo ajab tarah chahta tha main wo baat karti thi aur khwab dekhta tha main visal ka ho ki us ke firaq ka mausam wo lazzaten thin ki andar se tutta tha main chadha hua tha wo nashsha ki kam na hota tha hazar bar ubharta tha dubta tha main badan ka khel thin us ki mohabbaten lekin jo bhed jism ke the jaan se kholta tha main phir is tarah kabhi soya na is tarah jaga ki ruh nind mein thi aur jagta tha main kahan shikast hui aur kahan sila paya kisi ka ishq kisi se nibahta tha main main ahl-e-zar ke muqabil mein tha faqat shaer magar main jit gaya lafz haarta tha main
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था
Obaidullah Aleem
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पा-ब-ज़ंजीर सही ज़मज़मा-ख़्वाँ हैं हम लोग महफ़िल-ए-वक़्त तिरी रूह-ए-रवाँ हैं हम लोग दोश पर बार-ए-शब-ए-ग़म लिए गुल की मानिंद कौन समझे कि मोहब्बत की ज़बाँ हैं हम लोग ख़ूब पाया है सिला तेरी परस्तारी का देख ऐ सुब्ह-ए-तरब आज कहाँ हैं हम लोग इक मता-ए-दिल-ओ-जाँ पास थी सो हार चुके हाए ये वक़्त कि अब ख़ुद पे गराँ हैं हम लोग निकहत-ए-गुल की तरह नाज़ से चलने वालो हम भी कहते थे कि आसूदा-ए-जाँ हैं हम लोग कोई बतलाए कि कैसे ये ख़बर आम करें ढूँडती है जिसे दुनिया वो निशाँ हैं हम लोग क़िस्मत-ए-शब-ज़दगाँ जाग ही जाएगी 'अलीम' जरस-ए-क़ाफ़िला-ए-ख़ुश-ख़बराँ हैं हम लोग
Obaidullah Aleem
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चेहरा हुआ मैं और मिरी तस्वीर हुए सब मैं लफ़्ज़ हुआ मुझ में ही ज़ंजीर हुए सब बुनियाद भी मेरी दर-ओ-दीवार भी मेरे ता'मीर हुआ मैं कि ये ता'मीर हुए सब वैसे ही लिखोगे तो मिरा नाम भी होगा जो लफ़्ज़ लिखे वो मिरी जागीर हुए सब मरते हैं मगर मौत से पहले नहीं मरते ये वाक़िआ'' ऐसा है कि दिल-गीर हुए सब वो अहल-ए-क़लम साया-ए-रहमत की तरह थे हम इतने घटे अपनी ही ता'ज़ीर हुए सब उस लफ़्ज़ की मानिंद जो खुलता ही चला जाए ये ज़ात-ओ-ज़माँ मुझ से ही तहरीर हुए सब इतना सुख़न-ए-'मीर' नहीं सहल ख़ुदा ख़ैर नक़्क़ाद भी अब मो'तक़िद-ए-'मीर' हुए सब
Obaidullah Aleem
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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए
Obaidullah Aleem
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साहिब-ए-मेहर-ओ-वफ़ा अर्ज़-ओ-समा क्यूँँ चुप है हम पे तो वक़्त के पहरे हैं ख़ुदा क्यूँँ चुप है बे-सबब ग़म में सुलगना मिरी आदत ही सही साज़ ख़ामोश है क्यूँँ शोला-नवा क्यूँँ चुप है फूल तो सहम गए दस्त-ए-करम से दम-ए-सुब्ह गुनगुनाती हुई आवारा सबा क्यूँँ चुप है ख़त्म होगा न कभी सिलसिला-ए-अहल-ए-वफ़ा सोच ऐ दावर-ए-मक़्तल ये फ़ज़ा क्यूँँ चुप है मुझ पे तारी है रह-ए-इश्क़ की आसूदा थकन तुझ पे क्या गुज़री मिरे चाँद बता क्यूँँ चुप है जानने वाले तो सब जान गए होंगे 'अलीम' एक मुद्दत से तिरा ज़ेहन-ए-रसा क्यूँँ चुप है
Obaidullah Aleem
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