ghazalKuch Alfaaz

bola hain rang kitne zamane ke aur bhi us ne kaha hain bhed batane ke aur bhi bola tumhare dil men mohabbat ne ghar kiya main ne kaha hain rog lagane ke aur bhi main ne kaha vafa ki kabhi dastan suni bola hain qisse sunne sunane ke aur bhi izhar se buland hai main ne bataya ishq bola maze hain is ko jatane ke aur bhi batlaya rah-e-ishq hai dushvar soch lo kahne laga hain raste aane ke aur bhi bola hain rang kitne zamane ke aur bhi us ne kaha hain bhed batane ke aur bhi bola tumhaare dil mein mohabbat ne ghar kiya main ne kaha hain rog lagane ke aur bhi main ne kaha wafa ki kabhi dastan suni bola hain qisse sunne sunane ke aur bhi izhaar se buland hai main ne bataya ishq bola maze hain is ko jatane ke aur bhi batlaya rah-e-ishq hai dushwar soch lo kahne laga hain raste aane ke aur bhi

Related Ghazal

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

158 likes

उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

465 likes

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

102 likes

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

95 likes

More from Fakhira batool

इश्क़ पागल कर गया तो क्या करोगे सोच लो सानेहा ऐसा हुआ तो क्या करोगे सोच लो साथ उस के हर क़दम चलने की आदत किस लिए छोड़ कर वो चल दिया तो क्या करोगे सोच लो शोर बाहर है अभी इस वास्ते ख़ामोश हो शोर अंदर से उठा तो क्या करोगे सोच लो कर रहे हो घर नया ता'मीर उड़ती रेत पर ये अचानक गिर गया तो क्या करोगे सोच लो लौट कर जाना तो है आख़िर सभी को उस तरफ़ सौ बरस भी जी लिया तो क्या करोगे सोच लो धड़कनें मद्धम हुई जाती हैं ऐ चारागरो चाक दिल का सिल गया तो क्या करोगे सोच लो बंद पलकों में अधूरे ख़्वाब बनते हो मगर कोई इन में आ बसा तो क्या करोगे सोच लो दर दरीचे सब मुक़फ़्फ़ल कर के बैठे हो मगर वो अचानक आ गया तो क्या करोगे सोच लो डूबते सूरज का चेहरा और उस का नक़्श-ए-पा जब ये मंज़र गुम हुआ तो क्या करोगे सोच लो

Fakhira batool

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Fakhira batool.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Fakhira batool's ghazal.