chak-e-daman ko jo dekha to mila eid ka chand apni taqdir kahan bhuul gaya eid ka chand un ke abru-e-khamida ki tarah tikha hai apni ankhon men badi der chhupa eid ka chand jaane kyuun aap ke rukhsar mahak uthte hain jab kabhi kaan men chupke se kaha eid ka chand duur viran basere men diya ho jaise ghham ki divar se dekha to laga eid ka chand le ke halat ke sahraon men aa jaata hai aaj bhi khuld ki rangin faza eid ka chand talkhiyan badh gaiin jab ziist ke paimane men ghol kar dard ke maron ne piya eid ka chand chashm to vusat-e-aflak men khoi 'saghhar' dil ne ik aur jagah dhund liya eid ka chand chaak-e-daman ko jo dekha to mila eid ka chand apni taqdir kahan bhul gaya eid ka chand un ke abru-e-khamida ki tarah tikha hai apni aankhon mein badi der chhupa eid ka chand jaane kyun aap ke rukhsar mahak uthte hain jab kabhi kan mein chupke se kaha eid ka chand dur viran basere mein diya ho jaise gham ki diwar se dekha to laga eid ka chand le ke haalat ke sahraon mein aa jata hai aaj bhi khuld ki rangin faza eid ka chand talkhiyan badh gain jab zist ke paimane mein ghol kar dard ke maron ne piya eid ka chand chashm to wusat-e-aflak mein khoi 'saghar' dil ne ek aur jagah dhund liya eid ka chand
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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चारासाज़ों के बस की बात नहीं मैं दवाओं के बस की बात नहीं चाहता हूँ मैं दीमकों से नजात जो किताबों के बस की बात नहीं तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना इत्रदानों के बस की बात नहीं ख़त्म कर दे अज़ाब क़ब्रों का ताज-महलों के बस की बात नहीं आँसुओं में जो झिलमिलाहट है वो सितारों के बस की बात नहीं ऐसा लगता है अब तेरा दीदार सिर्फ़ आँखों के बस की बात नहीं
Fahmi Badayuni
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कल शब लिबास उस ने जो पहना गुलाब का ख़ुशबू गुलाब की कहीं चर्चा गुलाब का देखी हसीन लोगों की औलाद भी हसीन पौधे से उगता देखा है पौधा गुलाब का मैं था गुलाब तोड़ने वालों के शहर से और उस को चाहिए था बगीचा गुलाब का सुनते हो आज टूट गया लाडले का दिल अब उस के आगे ज़िक्र न करना गुलाब का
Kushal Dauneria
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
Bashir Badr
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मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गया ग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया इतनी दक़ीक़ शय कोई कैसे समझ सके यज़्दाँ के वाक़िआत से घबरा के पी गया छलके हुए थे जाम परेशाँ थी ज़ुल्फ़-ए-यार कुछ ऐसे हादसात से घबरा के पी गया मैं आदमी हूँ कोई फ़रिश्ता नहीं हुज़ूर मैं आज अपनी ज़ात से घबरा के पी गया दुनिया-ए-हादसात है इक दर्दनाक गीत दुनिया-ए-हादसात से घबरा के पी गया काँटे तो ख़ैर काँटे हैं इस का गिला ही क्या फूलों की वारदात से घबरा के पी गया 'साग़र' वो कह रहे थे कि पी लीजिए हुज़ूर उन की गुज़ारिशात से घबरा के पी गया
Saghar Siddiqui
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ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा जा चुकी है बहार चुप हो जा अब न आएँगे रूठने वाले दीदा-ए-अश्क-बार चुप हो जा जा चुका कारवान-लाला-ओ-गुल उड़ रहा है ग़ुबार चुप हो जा छूट जाती है फूल से ख़ुश्बू रूठ जाते हैं यार चुप हो जा हम फ़क़ीरों का इस ज़माने में कौन है ग़म-गुसार चुप हो जा हादसों की न आँख खुल जाए हसरत-ए-सोगवार चुप हो जा गीत की ज़र्ब से भी ऐ 'साग़र' टूट जाते हैं तार चुप हो जा
Saghar Siddiqui
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