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चलते चलते ये गली बे-जान होती जाएगी रात होती जाएगी सुनसान होती जाएगी देखना क्या है नज़र-अंदाज़ करना है किसे मंज़रों की ख़ुद-ब-ख़ुद पहचान होती जाएगी उस के चेहरे पर मुसलसल आँख रुक सकती नहीं आँख बार-ए-हुस्न से हलकान होती जाएगी सोच लो ये दिल-लगी भारी न पड़ जाए कहीं जान जिस को कह रहे हो जान होती जाएगी कर ही क्या सकती है दुनिया और तुझ को देख कर देखती जाएगी और हैरान होती जाएगी काकुल-ए-ख़मदार में ख़म और आते जाएँगे ज़ुल्फ़ उस की और भी शैतान होती जाएगी आते आते इश्क़ करने का हुनर आ जाएगा रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी आसान होती जाएगी जा चुकीं ख़ुशियाँ तो अब ग़म हिजरतें करने लगे दिल की बस्ती इस तरह वीरान होती जाएगी

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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कोई हसीं तो कोई दर्दनाक समझेगा मेरा मिजाज़ वही ठीक ठाक समझेगा मैं जिस के साथ कई रातों से हूँ उस का नाम बता तो दूँगा मगर तू मज़ाक़ समझेगा वो जिस हिसाब से गाता है उस से लगता है कि मेरे दुख को तो बस बी प्राक समझेगा

Kushal Dauneria

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कि जैसे कोई मुसाफ़िर वतन में लौट आए हुई जो शाम तो फिर से थकन में लौट आए न आबशार न सहरा लगा सके क़ीमत हम अपनी प्यास को ले कर दहन में लौट आए सफ़र तवील बहुत था किसी की आँखों तक तो उस के बा'द हम अपने बदन में लौट आए कभी गए थे हवाओं का सामना करने सभी चराग़ उसी अंजुमन में लौट आए किसी तरह तो फ़ज़ाओं की ख़ामुशी टूटे तो फिर से शोर-ए-सलासिल चलन में लौट आए 'अमीर' इमाम बताओ ये माजरा क्या है तुम्हारे शे'र उसी बाँकपन में लौट आए

Ameer Imam

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यूँँ मिरे होने को मुझ पर आश्कार उस ने किया मुझ में पोशीदा किसी दरिया को पार उस ने किया पहले सहरा से मुझे लाया समुंदर की तरफ़ नाव पर काग़ज़ की फिर मुझ को सवार उस ने किया मैं था इक आवाज़ मुझ को ख़ामुशी से तोड़ कर किर्चियों को देर तक मेरी शुमार उस ने किया दिन चढ़ा तो धूप की मुझ को सलीबें दे गया रात आई तो मिरे बिस्तर को दार उस ने किया जिस को उस ने रौशनी समझा था मेरी धूप थी शाम होने का मिरी फिर इंतिज़ार उस ने किया देर तक बुनता रहा आँखों के करघे पर मुझे बुन गया जब मैं तो मुझ को तार तार उस ने किया

Ameer Imam

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ज़मीं के सारे मनाज़िर से कट के सोता हूँ मैं आसमाँ के सफ़र से पलट के सोता हूँ मैं जम्अ'' करता हूँ शब के सियाही क़तरों को ब-वक़्त-ए-सुब्ह फिर उन को पलट के सोता हूँ तलाश धूप में करता हूँ सारा दिन ख़ुद को तमाम-रात सितारों में बट के सोता हूँ कहाँ सुकूँ कि शब-ओ-रोज़ घूमना उस का ज़रा ज़मीन के मेहवर से हट के सोता हूँ तिरे बदन की ख़लाओं में आँख खुलती है हवा के जिस्म से जब जब लिपट के सोता हूँ मैं जाग जाग के रातें गुज़ारने वाला इक ऐसी रात भी आती है डट के सोता हूँ

Ameer Imam

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वो अपने बंद-ए-क़बा खोलती तो क्या लगती ख़ुदा के वास्ते कोई कहे ख़ुदा-लगती यक़ीन थी तो यक़ीं में समा गई कैसे गुमान थी तो गुमाँ से भी मावरा लगती अगर बिखरती तो सूरज कभी नहीं उगता तिरा ख़याल कि वो ज़ुल्फ़ बस घटा लगती तिरे मरीज़ को दुनिया में कुछ नहीं लगता दवा लगे न रक़ीबों की बद-दुआ' लगती हुई है क़ैद ज़माने में रौशनी किस से भला वो जिस्म और उस को कोई क़बा लगती लगी वो तुझ सी तो आलम में मुनफ़रिद ठहरी वगर्ना आम सी लगती अगर जुदा लगती

Ameer Imam

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उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए आँखों को टूटे ख़्वाब का हर्जाना चाहिए वो काम रह के करना पड़ा शहर में हमें मजनूँ को जिस के वास्ते वीराना चाहिए इस ज़ख़्म-ए-दिल पे आज भी सुर्ख़ी को देख कर इतरा रहे हैं हम हमें इतराना चाहिए तन्हाइयों पे अपनी नज़र कर ज़रा कभी ऐ बेवक़ूफ़ दिल तुझे घबराना चाहिए है हिज्र तो कबाब न खाने से क्या उसूल गर इश्क़ है तो क्या हमें मर जाना चाहिए दानाइयाँ भी ख़ूब हैं लेकिन अगर मिले धोखा हसीन सा तो उसे खाना चाहिए बीते दिनों की कोई निशानी तो साथ हो जान-ए-हया तुम्हें ज़रा शर्माना चाहिए इस शाइ'री में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए

Ameer Imam

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