ghazalKuch Alfaaz

देखो उस का हिज्र निभाना पड़ता है वो जैसा चाहे हो जाना पड़ता है सुनते कब हैं लोग हमें बस देखते हैं चेहरे को आवाज़ बनाना पड़ता है इन अंधे और बहरे लोगों को साईं होने का एहसास दिलाना पड़ता है अभी हमारे अंदर आग नहीं भड़की अभी हमें सिगरेट सुलगाना पड़ता है कुछ आँखें ही ऐसी होती हैं जिन को कोई न कोई ख़्वाब दिखाना पड़ता है इस दुनिया को छोड़ के जिस में तुम भी हो जाता कौन है लेकिन जाना पड़ता है कुछ फूलों की ख़ातिर भी कुछ फूलों का सब से अच्छा रंग चुराना पड़ता है

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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तू समझता है तेरा हिज्र गवारा कर के बैठ जाएँगे मोहब्बत से किनारा कर के ख़ुद-कुशी करने नहीं दी तेरी आँखों ने मुझे लौट आया हूँ मैं दरिया का नज़ारा कर के जी तो करता है उसे पाँव तले रौंदने को छोड़ देता हूँ मुक़द्दर का सितारा कर के करना हो तर्क-ए-त'अल्लुक़ तो कुछ ऐसे करना हम को तकलीफ़ न हो ज़िक्र तुम्हारा कर के इस लिए उस को दिलाता हूँ मैं ग़ुस्सा 'ताबिश' ताकि देखूँ मैं उसे और भी प्यारा कर के

Abbas Tabish

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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी

Umair Najmi

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ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं और क्या जुर्म है पता ही नहीं इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है दूसरा कोई रास्ता ही नहीं सच घटे या बढ़े तो सच न रहे झूट की कोई इंतिहा ही नहीं ज़िंदगी अब बता कहाँ जाएँ ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं जिस के कारन फ़साद होते हैं उस का कोई अता-पता ही नहीं कैसे अवतार कैसे पैग़मबर ऐसा लगता है अब ख़ुदा ही नहीं चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो आईना झूट बोलता ही नहीं अपनी रचनाओं में वो ज़िंदा है 'नूर' संसार से गया ही नहीं

Krishna Bihari Noor

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इश्क़ में दान करना पड़ता है जाँ को हलकान करना पड़ता है तजरबा मुफ़्त में नहीं मिलता पहले नुक़सान करना पड़ता है उस की बे-लफ़्ज़ गुफ़्तुगू के लिए आँख को कान करना पड़ता है फिर उदासी के भी तक़ाज़े हैं घर को वीरान करना पड़ता है

Mehshar Afridi

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कोई फूल मुझ में खिला दिया तेरे इश्क़ ने मुझे रंग-साज़ बना दिया तेरे इश्क़ ने उन्हें पाँच वक़्तों के चंद सज्दों से क्या गरज़ जिन्हें पूरा-पूरा झुका दिया तेरे इश्क़ ने मैं वो ख़ाक हूँ कि जो धूल है तेरे पाऊँ की मैं वो आब जिस को जला दिया तेरे इश्क़ ने

Nadeem Bhabha

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मैं खुजूरों-भरे सहराओं में देखा गया हूँ तख़्त के बा'द तिरे पाँव में देखा गया हूँ दफ़्न होती हुई झीलों में ठिकाने हैं मिरे ख़ुश्क होते हुए दरियाओं में देखा गया हूँ मस्जिदों और मज़ारों में मिरे चर्चे हैं मंदिरों और कलीसाओं में देखा गया हूँ लम्हा भर को मिरे सर पर कोई बादल आया कहने वालों ने कहा छाँव में देखा गया हूँ फिर मुझे ख़ुद भी ख़बर हो न सकी मैं हूँ कहाँ आख़िरी बार तिरे गाँव में देखा गया हूँ वस्ल के तीन सौ तेरह में कहीं हूँ मौजूद हिज्र के मारका-आराओं में देखा गया हूँ

Nadeem Bhabha

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हमारे हाफ़िज़े बे-कार हो गए साहिब जवाब और भी दुश्वार हो गए साहिब उसे भी शौक़ था तस्वीर में उतरने का तो हम भी शौक़ से दीवार हो गए साहिब तिरे लिबास के रंगों में खो गई फ़ितरत ये फूल-शूल तो बे-कार हो गए साहिब गले लगा के उसे ख़्वाब में बहुत रोए और इतना रोए कि बेदार हो गए साहिब हमारी रूह परिंदों को सौंप दी जाए कि ये बदन तो गुनहगार हो गए साहिब नज़र मिलाई तो इक आग ने लपेट लिया बदन जलाए तो गुलज़ार हो गए साहिब चराग़ दफ़्न किए थे 'नदीम' क़ब्रों में ज़मीं से चाँद नुमूदार हो गए साहिब

Nadeem Bhabha

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हिज्र हूँ पूरा हिज्र हूँ इश्क़ विसाल करे दिल की धड़कन ताल हो जिस्म धमाल करे देखूँ उस की चाँदनी चाँद से भी शफ़्फ़ाफ़ और सुनहरी रौशनी अपना जमाल करे गंदुम जैसे रंग पर काली चादर तान गीतों जैसी ज़िंदगी बे-सुर-ताल करे मंज़र से जो दूर हैं उन पर करे निगाह ध्यान से पहले देखना वही कमाल करे उस का इक पल देखना, उस पर दरूद सलाम हिज्र भरी जो ज़िंदगी ऐन विसाल करे अपना मुझ को रूप दे, अपना आशिक़ हो जो भी उस का हाल है मेरा हाल करे सारे सवाल आसान हैं मुश्किल एक जवाब हम भी एक जवाब हैं कोई सवाल करे

Nadeem Bhabha

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वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं हम सितारे हैं मगर रात से निकले हुए हैं ख़ामुशी हम पे गिरी आख़िरी मिट्टी की तरह ऐसे चुप हैं कि हर इक बात से निकले हुए हैं हम किसी ज़ोम में नाराज़ हुए हैं तुझ से हम किसी बात पे औक़ात से निकले हुए हैं ये मिरा ग़म है मिरे दोस्त मगर तू ये समझ अश्क तो शिद्दत-ए-जज़्बात से निकले हुए हैं हम ग़ुलामी को मुक़द्दर की तरह जानते हैं हम तिरी जीत तिरी मात से निकले हुए हैं

Nadeem Bhabha

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