dukhe hue hain hamen aur ab dukhao mat jo ho gae ho fasana to yaad aao mat khayal-o-khvab men parchhaiyan si nachti hain ab is tarah to miri ruuh men samao mat zamin ke log to kya do dilon ki chahat men khuda bhi ho to use darmiyan laao mat tumhara sar nahin tiflan-e-rah-guzar ke liye dayar-e-sang men ghar se nikal ke jaao mat sivae apne kisi ke bhi ho nahin sakte ham aur log hain logo hamen satao mat hamare ahd men ye rasm-e-ashiqi thahri faqir ban ke raho aur sada lagao mat vahi likho jo lahu ki zaban se milta hai sukhan ko parda-e-alfaz men chhupao mat supurd kar hi diya atish-e-hunar ke to phir tamam khaak hi ho jaao kuchh bachao mat dukhe hue hain hamein aur ab dukhao mat jo ho gae ho fasana to yaad aao mat khayal-o-khwab mein parchhaiyan si nachti hain ab is tarah to meri ruh mein samao mat zamin ke log to kya do dilon ki chahat mein khuda bhi ho to use darmiyan lao mat tumhaara sar nahin tiflan-e-rah-guzar ke liye dayar-e-sang mein ghar se nikal ke jao mat siwae apne kisi ke bhi ho nahin sakte hum aur log hain logo hamein satao mat hamare ahd mein ye rasm-e-ashiqi thahri faqir ban ke raho aur sada lagao mat wahi likho jo lahu ki zaban se milta hai sukhan ko parda-e-alfaz mein chhupao mat supurd kar hi diya aatish-e-hunar ke to phir tamam khak hi ho jao kuchh bachao mat
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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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वैसे मैं ने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है मैं उस को अपनी वहशत तोहफ़े में दूँ हाथ उठाए जिस ने सहरा देखा है बिन देखे उस की तस्वीर बना लूँगा आज तो मैं ने उस को इतना देखा है एक नज़र में मंज़र कब खुलते हैं दोस्त तू ने देखा भी है तो क्या देखा है इश्क़ में बंदा मर भी सकता है मैं ने दिल की दस्तावेज़ में लिखा देखा है मैं तो आँखें देख के ही बतला दूँगा तुम में से किस किस ने दरिया देखा है आगे सीधे हाथ पे एक तराई है मैं ने पहले भी ये रस्ता देखा है तुम को तो इस बाग़ का नाम पता होगा तुम ने तो इस शहर का नक़्शा देखा है
Tehzeeb Hafi
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए
Obaidullah Aleem
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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था
Obaidullah Aleem
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शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है ये शहर दिल से ज़ियादा दुखा सा लगता है हर इक के साथ कोई वाक़िआ' सा लगता है जिसे भी देखो वो खोया हुआ सा लगता है ज़मीन है सो वो अपनी गर्दिशों में कहीं जो चाँद है सो वो टूटा हुआ सा लगता है मेरे वतन पे उतरते हुए अँधेरों को जो तुम कहो मुझे क़हर-ए-ख़ुदा सा लगता है जो शाम आई तो फिर शाम का लगा दरबार जो दिन हुआ तो वो दिन कर्बला सा लगता है ये रात खा गई इक एक कर के सारे चराग़ जो रह गया है वो बुझता हुआ सा लगता है दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊँ वो एक शख़्स जो दिल को दुआ सा लगता है तो दिल में बुझने सी लगती है काएनात तमाम कभी कभी जो मुझे तू बुझा सा लगता है जो आ रही है सदा ग़ौर से सुनो उस को कि इस सदा में ख़ुदा बोलता सा लगता है अभी ख़रीद लें दुनिया कहाँ की महँगी है मगर ज़मीर का सौदा बुरा सा लगता है ये मौत है या कोई आख़िरी विसाल के बा'द अजब सुकून में सोया हुआ सा लगता है हवा-ए-रंग-ए-दो-आलम में जागती हुई लय 'अलीम' ही कहीं नग़्मा-सरा सा लगता है
Obaidullah Aleem
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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ
Obaidullah Aleem
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अज़ाब आए थे ऐसे कि फिर न घर से गए वो ज़िंदा लोग मिरे घर के जैसे मर से गए हज़ार तरह के सद में उठाने वाले लोग न जाने क्या हुआ इक आन में बिखर से गए बिछड़ने वालों का दुख हो तो सोच लेना यही कि इक नवा-ए-परेशाँ थे रहगुज़र से गए हज़ार राह चले फिर वो रहगुज़र आई कि इक सफ़र में रहे और हर सफ़र से गए कभी वो जिस्म हुआ और कभी वो रूह तमाम उसी के ख़्वाब थे आँखों में हम जिधर से गए ये हाल हो गया आख़िर तिरी मोहब्बत में कि चाहते हैं तुझे और तिरी ख़बर से गए मिरा ही रंग थे तो क्यूँँ न बस रहे मुझ में मिरा ही ख़्वाब थे तो क्यूँँ मिरी नज़र से गए जो ज़ख़्म ज़ख़्म-ए-ज़बाँ भी है और नुमू भी है तो फिर ये वहम है कैसा कि हम हुनर से गए
Obaidullah Aleem
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