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jab tira hukm mila tark mohabbat kar di dil magar is pe vo dhadka ki qayamat kar di tujh se kis tarah main izhar-e-tamanna karta lafz sujha to muani ne baghhavat kar di main to samjha tha ki laut aate hain jaane vaale tu ne ja kar to judai miri qismat kar di tujh ko puuja hai ki asnam-parasti ki hai main ne vahdat ke mafahim ki kasrat kar di mujh ko dushman ke iradon pe bhi pyaar aata hai tiri ulfat ne mohabbat miri aadat kar di puchh baitha huun main tujh se tire kuche ka pata tere halat ne kaisi tiri surat kar di kya tira jism tire husn ki hiddat men jala raakh kis ne tiri sone ki si rangat kar di jab tera hukm mila tark mohabbat kar di dil magar is pe wo dhadka ki qayamat kar di tujh se kis tarah main izhaar-e-tamanna karta lafz sujha to muani ne baghawat kar di main to samjha tha ki laut aate hain jaane wale tu ne ja kar to judai meri qismat kar di tujh ko puja hai ki asnam-parasti ki hai main ne wahdat ke mafahim ki kasrat kar di mujh ko dushman ke iradon pe bhi pyar aata hai teri ulfat ne mohabbat meri aadat kar di puchh baitha hun main tujh se tere kuche ka pata tere haalat ne kaisi teri surat kar di kya tera jism tere husn ki hiddat mein jala rakh kis ne teri sone ki si rangat kar di

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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तू बिगड़ता भी है ख़ास अपने ही अंदाज़ के साथ फूल खिलते हैं तिरे शोला-ए-आवाज़ के साथ एक बार और भी क्यूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना न करूँँ कि तू इनकार भी करता है अजब नाज़ के साथ लय जो टूटी तो सदा आई शिकस्त-ए-दिल की रग-ए-जाँ का कोई रिश्ता है रग-ए-साज़ के साथ तू पुकारे तो चमक उठती हैं मेरी आँखें तेरी सूरत भी है शामिल तिरी आवाज़ के साथ जब तक अर्ज़ां है ज़माने में कबूतर का लहू ज़ुल्म है रब्त रखूँ गर किसी शहबाज़ के साथ पस्त इतनी तो न थी मेरी शिकस्त ऐ यारो पर समेटे हैं मगर हसरत परवाज़ के साथ पहरे बैठे हैं क़फ़स पर कि है सय्याद को वहम पर-शिकस्तों को भी इक रब्त है परवाज़ के साथ उम्र भर संग-ज़नी करते रहे अहल-ए-वतन ये अलग बात कि दफ़नाएँगे ए'ज़ाज़ के साथ

Ahmad Nadeem Qasmi

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जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ सूरज को ग़ुरूब से बचाऊँ बस मेरा चले जो गर्दिशों पर दिन को भी न चाँद को बुझाऊँ मैं छोड़ के सीधे रास्तों को भटकी हुई नेकियाँ कमाऊँ इम्कान पे इस क़दर यक़ीं है सहराओं में बीज डाल आऊँ मैं शब के मुसाफ़िरों की ख़ातिर मिशअल न मिले तो घर जलाऊँ अश'आर हैं मेरे इस्तिआरे आओ तुम्हें आइने दिखाऊँ यूँँ बट के बिखर के रह गया हूँ हर शख़्स में अपना अक्स पाऊँ आवाज़ जो दूँ किसी के दर पर अंदर से भी ख़ुद निकल के आऊँ ऐ चारागरान-ए-अस्र-ए-हाज़िर फ़ौलाद का दिल कहाँ से लाऊँ हर रात दुआ करूँँ सहर की हर सुब्ह नया फ़रेब खाऊँ हर जब्र पे सब्र कर रहा हूँ इस तरह कहीं उजड़ न जाऊँ रोना भी तो तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू है आँखें जो रुकें तो लब हिलाऊँ ख़ुद को तो 'नदीम' आज़माया अब मर के ख़ुदा को आज़माऊँ

Ahmad Nadeem Qasmi

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मिरा ग़ुरूर तुझे खो के हार मान गया मैं चोट खा के मगर अपनी क़द्र जान गया कहीं उफ़ुक़ न मिला मेरी दश्त-गर्दी को मैं तेरी धुन में भरी काएनात छान गया ख़ुदा के बा'द तो बे-इंतिहा अँधेरा है तिरी तलब में कहाँ तक न मेरा ध्यान गया जबीं पे बल भी न आता गँवा के दोनों-जहाँ जो तू छिना तो मैं अपनी शिकस्त मान गया बदलते रंग थे तेरी उमंग के ग़म्माज़ तू मुझ से बिछड़ा तो मैं तेरा राज़ जान गया ख़ुद अपने आप से मैं शिकवा-संज आज भी हूँ 'नदीम' यूँँ तो मुझे इक जहान मान गया

Ahmad Nadeem Qasmi

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कहीं वो मेरी मोहब्बत में घुल रहा ही न हो ख़ुदा करे उसे ये तजरबा हुआ ही न हो सुपुर्दगी मिरा मेआ'र तो नहीं लेकिन मैं सोचता हूँ तिरे रूप में ख़ुदा ही न हो मैं तुझ को पा के भी किस शख़्स की तलाश में हूँ मिरे ख़याल में कोई तिरे सिवा ही न हो वो उज़्र कर कि मिरे दिल को भी यक़ीं आए वो गीत गा कि जो मैं ने कभी सुना ही न हो वो बात कर जिसे फैला के मैं ग़ज़ल कह लूँ सुनाऊँ शे'र जो मैं ने अभी लिखा ही न हो सहर को दिल की तरफ़ ये धुआँ सा कैसा है कहीं ये मेरा दिया रात-भर जला ही न हो हो कैसे जब्र-ए-मशीयत को इस दुआ का लिहाज़ जो एक बार मिले फिर कभी जुदा ही न हो ये अब्र-ओ-किश्त की दुनिया में कैसे मुमकिन है कि उम्र-भर की वफ़ा का कोई सिला ही न हो मिरी निगाह में वो पेड़ भी है बद-किर्दार लदा हुआ हो जो फल से मगर झुका ही न हो जो दश्त दश्त से फूलों की भीक माँगता था कहीं वो तोड़ के कश्कोल मर गया ही न हो तुलू-ए-सुब्ह ने चमका दिए हैं अब्र के चाक 'नदीम' ये मिरा दामान-ए-मुद्दआ' ही न हो

Ahmad Nadeem Qasmi

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फिर भयानक तीरगी में आ गए हम गजर बजने से धोका खा गए हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ आँख क्या खोली चमन मुरझा गए कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब आइने की चादरें फैला गए किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए उन का आना हश्र से कुछ कम न था और जब पलटे क़यामत ढा गए इक पहेली का हमें दे कर जवाब इक पहेली बन के हर सू छा गए फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम हम तो इस तकरार से उकता गए रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही आज सय्यारे अगर टकरा गए क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद वो छुपाते ही रहे हम पा गए बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम' जिन को मेरे वलवले रास आ गए

Ahmad Nadeem Qasmi

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