jhuum ke jab rindon ne pila di shaikh ne chupke chupke du'a di ek kami thi taj-mahal men main ne tiri tasvir laga di aap ne jhuta va'da kar ke aaj hamari 'umr badha di haae ye un ka tarz-e-mohabbat aankh se bas ik buund gira di jhum ke jab rindon ne pila di shaikh ne chupke chupke du'a di ek kami thi taj-mahal mein main ne teri taswir laga di aap ne jhuta wa'da kar ke aaj hamari 'umr badha di hae ye un ka tarz-e-mohabbat aankh se bas ek bund gira di
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़ सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है पि यूँँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
Mirza Ghalib
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जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़ उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़ मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ुद को बाँटा है बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़ एक तरफ़ मुझे जल्दी है उस के दिल में घर करने की एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़ यूँँ तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन तुझ से जुदा होने के बा'द का पहला हफ़्ता एक तरफ़ उस की आँखों ने मुझ सेे मेरी ख़ुद्दारी छीनी वरना पाँव की ठोकर से कर देता था मैं दुनिया एक तरफ़ मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता उस ने सहरा एक तरफ़ रक्खा और दरिया एक तरफ़
Tehzeeb Hafi
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टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे अपने बिखरे हुए टुकड़ों को समेटे कब तक एक इंसान की ख़ातिर कोई कितना टूटे कोई टुकड़ा तेरी आँखों में न चुभ जाए कहीं दूर हो जा कि मेरे ख़्वाब का शीशा टूटे मैं किसी और को सोचूँ तो मुझे होश आए मैं किसी और को देखूँ तो ये नश्शा टूटे रंज होता है तो ऐसा कि बताए न बने जब किसी अपने के बाइ'से कोई अपना टूटे पास बैठे हुए यारों को ख़बर तक न हुई हम किसी बात पे इस दर्जा अनोखा टूटे इतनी जल्दी तो सँभलने की तवक़्क़ो' न करो वक़्त ही कितना हुआ है मेरा सपना टूटे दाद की भीक न माँग ऐ मेरे अच्छे शाएर जा तुझे मेरी दुआ है तेरा कासा टूटे तू उसे किस के भरोसे पे नहीं कात रही चर्ख़ को देखने वाली तेरा चर्ख़ा टूटे वर्ना कब तक लिए फिरता रहूँ उस को 'जव्वाद' कोई सूरत हो कि उम्मीद से रिश्ता टूटे
Jawwad Sheikh
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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तुम से न मिल के ख़ुश हैं वो दावा किधर गया दो रोज़ में गुलाब सा चेहरा उतर गया जान-ए-बहार तुम ने वो काँटे चुभोए हैं मैं हर गुल-ए-शगुफ़्ता को छूने से डर गया इस दिल के टूटने का मुझे कोई ग़म नहीं अच्छा हुआ कि पाप कटा दर्द-ए-सर गया मैं भी समझ रहा हूँ कि तुम तुम नहीं रहे तुम भी ये सोच लो कि मिरा 'कैफ़' मर गया
Kaif Bhopali
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ख़ानक़ाह में सूफ़ी मुँह छुपाए बैठा है ग़ालिबन ज़माने से मात खाए बैठा है क़त्ल तो नहीं बदला क़त्ल की अदा बदली तीर की जगह क़ातिल साज़ उठाए बैठा है उन के चाहने वाले धूप धूप फिरते हैं ग़ैर उन के कूचे में साए साए बैठा है वाए आशिक़-ए-नादाँ काएनात ये तेरी इक शिकस्ता शीशे को दिल बनाए बैठा है दूर बारिश ऐ गुलचीं वा है दीदा-ए-नर्गिस आज हर गुल-ए-नर्गिस ख़ार खाए बैठा है
Kaif Bhopali
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न आया मज़ा शब की तन्हाइयों में सहर हो गई चंद अंगड़ाइयों में न रंगीनियों में न रानाइयों में नज़र घिर गई अपनी परछाइयों में मुझे मुस्कुरा मुस्कुरा कर न देखो मिरे साथ तुम भी हो रुस्वाइयों में ग़ज़ब हो गया उन की महफ़िल से आना घिरा जा रहा हूँ तमाशाइयों में मोहब्बत है या आज तर्क-ए-मोहब्बत ज़रा मिल तो जाएँ वो तन्हाइयों में इधर आओ तुम को नज़र लग न जाए छुपा लूँ तुम्हें दिल की गहराइयों में अरे सुनने वालो ये नग़्में नहीं हैं मिरे दिल की चीख़ें हैं शहनाइयों में वो ऐ 'कैफ़' जिस दिन से मेरे हुए हैं तो सारा ज़माना है शैदाइयों में
Kaif Bhopali
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हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है गुफाओं से पहाड़ों से बयाबानों से ग़ारों से बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से कभी पत्थर के दिल ऐ 'कैफ़' पिघले हैं न पिघलेंगे मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से
Kaif Bhopali
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सलाम उस पर अगर ऐसा कोई फ़नकार हो जाए सियाही ख़ून बन जाए क़लम तलवार हो जाए ज़माने से कहो कुछ साइक़ा-रफ़्तार हो जाए हमारे साथ चलने के लिए तय्यार हो जाए ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए वो ज़ुल्फ़ें साँप हैं बे-शक अगर ज़ंजीर बन जाएँ मोहब्बत ज़हर है बे-शक अगर आज़ार हो जाए मोहब्बत से तुम्हें सरकार कहते हैं वगरना हम निगाहें डाल दें जिस पर वही सरकार हो जाए
Kaif Bhopali
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