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jis ki saundhi saundhi khushbu angan angan palti thi us mitti ka bojh uthate jism ki mitti galti thi jis ko taap ke garm lihafon men bachche so jaate the dil ke chulhe men har dam vo aag barabar jalti thi garm do-pahron men jalte sehnon men jhadu dete the jin budhe hathon se pak kar roti phuul men dhalti thi kisi kahani men virani men jab dil ghabrata tha kisi aziiz dua ki khushbu saath hamare chalti thi gard udate zard bagule dar par dastak dete the aur khasta-divaron ki pal bhar men shakl badalti thi khushk khajur ke patton se jab niind ka bistar sajta tha khvab-nagar ki shahzadi galiyon men aan nikalti thi din aata tha aur siine men shaam ka khaka banta tha shaam aati thi aur jismon men shaam bhi akhir dhalti thi jis ki saundhi saundhi khushbu aangan aangan palti thi us mitti ka bojh uthate jism ki mitti galti thi jis ko tap ke garm lihafon mein bachche so jate the dil ke chulhe mein har dam wo aag barabar jalti thi garm do-pahron mein jalte sehnon mein jhadu dete the jin budhe hathon se pak kar roti phul mein dhalti thi kisi kahani mein virani mein jab dil ghabraata tha kisi aziz dua ki khushbu sath hamare chalti thi gard udate zard bagule dar par dastak dete the aur khasta-diwaron ki pal bhar mein shakl badalti thi khushk khajur ke patton se jab nind ka bistar sajta tha khwab-nagar ki shahzadi galiyon mein aan nikalti thi din aata tha aur sine mein sham ka khaka banta tha sham aati thi aur jismon mein sham bhi aakhir dhalti thi

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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दिल के सूने सहन में गूँजी आहट किस के पाँव की धूप-भरे सन्नाटे में आवाज़ सुनी है छाँव की इक मंज़र में सारे मंज़र पस-मंज़र हो जाने हैं इक दरिया में मिल जानी हैं लहरें सब दरियाओं की दश्त-नवर्दी और हिजरत से अपना गहरा रिश्ता है अपनी मिट्टी में शामिल है मिट्टी कुछ सहराओं की बारिश की बूँदों से बन में तन में एक बहार आई घर घर गाए गीत गगन ने गूँजीं गलियाँ गाँव की सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माँओं की इक जैसा एहसास लहू में जीता जागता रहता है एक उदासी दे जाती है दस्तक रोज़ हवाओं की सीनों और ज़मीनों का अब मंज़र-नामा बदलेगा हर सू कसरत हो जानी है फूलों और दु'आओं की

Hammad Niyazi

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