ghazalKuch Alfaaz

कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तिरी आस तेरे गुमान में सबा कह गई मिरे कान में मिरे साथ आ उसे भूल जा किसी आँख में नहीं अश्क-ए-ग़म तिरे बअ'द कुछ भी नहीं है कम तुझे ज़िंदगी ने भुला दिया तू भी मुस्कुरा उसे भूल जा कहीं चाक-ए-जाँ का रफ़ू नहीं किसी आस्तीं पे लहू नहीं कि शहीद-ए-राह-ए-मलाल का नहीं ख़ूँ-बहा उसे भूल जा क्यूँँ अटा हुआ है ग़ुबार में ग़म-ए-ज़िंदगी के फ़िशार में वो जो दर्द था तिरे बख़्त में सो वो हो गया उसे भूल जा तुझे चाँद बन के मिला था जो तिरे साहिलों पे खिला था जो वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा

Related Ghazal

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा इतना मत चाहो उसे वो बे-वफ़ा हो जाएगा हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िंदगी ने कह दिया तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जाएगा मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा सब उसी के हैं हवा ख़ुशबू ज़मीन ओ आसमाँ मैं जहाँ भी जाऊँगा उस को पता हो जाएगा

Bashir Badr

43 likes

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

102 likes

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

95 likes

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

61 likes

More from Amjad Islam Amjad

न आसमाँ से न दुश्मन के ज़ोर ओ ज़र से हुआ ये मोजज़ा तो मिरे दस्त-ए-बे-हुनर से हुआ क़दम उठा है तो पाँव तले ज़मीं ही नहीं सफ़र का रंज हमें ख़्वाहिश-ए-सफ़र से हुआ मैं भीग भीग गया आरज़ू की बारिश में वो अक्स अक्स में तक़्सीम चश्म-ए-तर से हुआ सियाही शब की न चेहरों पे आ गई हो कहीं सहर का ख़ौफ़ हमें आईनों के डर से हुआ कोई चले तो ज़मीं साथ साथ चलती है ये राज़ हम पे अयाँ गर्द-ए-रहगुज़र से हुआ तिरे बदन की महक ही न थी तो क्या रुकते गुज़र हमारा कई बार यूँँ तो घर से हुआ कहाँ पे सोए थे 'अमजद' कहाँ खुलीं आँखें गुमाँ क़फ़स का हमें अपने बाम-ओ-दर से हुआ

Amjad Islam Amjad

1 likes

याद के सहरा में कुछ तो ज़िंदगी आए नज़र सोचता हूँ अब बना लूँ रेत से ही कोई घर किस क़दर यादें उभर आई हैं तेरे नाम से एक पत्थर फेंकने से पड़ गए कितने भँवर वक़्त के अंधे कुएँ में पल रही है ज़िंदगी ऐ मिरे हुस्न-ए-तख़य्युल बाम से नीचे उतर तू असीर-ए-आबरू-ए-शेवा-ए-पिंदार-ए-हुस्न मैं गिरफ़्तार-ए-निगाह-ए-ज़िंदगी-ए-मुख़्तसर ज़ब्त के क़र्ये में 'अमजद' देखिए कैसे कटे सोच की सूनी सड़क पर याद का लम्बा सफ़र

Amjad Islam Amjad

0 likes

पर्दे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है है जिस के दम से गर्मी-ए-बाज़ार कौन है वो सामने है फिर भी दिखाई न दे सके मेरे और उस के बीच ये दीवार कौन है बाग़-ए-वफ़ा में हो नहीं सकता ये फ़ैसला सय्याद याँ पे कौन गिरफ़्तार कौन है माना नज़र के सामने है बे-शुमार धुँद है देखना कि धुँद के इस पार कौन है कुछ भी नहीं है पास पे रहता है फिर भी ख़ुश सब कुछ है जिस के पास वो बेज़ार कौन है यूँँ तो दिखाई देते हैं असरार हर तरफ़ खुलता नहीं कि साहिब-ए-असरार कौन है 'अमजद' अलग सी आप ने खोली है जो दुकाँ जिंस-ए-हुनर का याँ ये ख़रीदार कौन है

Amjad Islam Amjad

0 likes

अगरचे कोई भी अंधा नहीं था लिखा दीवार का पढ़ता नहीं था कुछ ऐसी बर्फ़ थी उस की नज़र में गुज़रने के लिए रस्ता नहीं था तुम्हीं ने कौन सी अच्छाई की है चलो माना कि मैं अच्छा नहीं था खुली आँखों से सारी उम्र देखा इक ऐसा ख़्वाब जो अपना नहीं था मैं उस की अंजुमन में था अकेला किसी ने भी मुझे देखा नहीं था सहर के वक़्त कैसे छोड़ जाता तुम्हारी याद थी सपना नहीं था खड़ी थी रात खिड़की के सिरहाने दरीचे में वो चाँद उतरा नहीं था दिलों में गिरने वाले अश्क चुनता कहीं इक जौहरी ऐसा नहीं था कुछ ऐसी धूप थी उन के सरों पर ख़ुदा जैसे ग़रीबों का नहीं था अभी हर्फ़ों में रंग आते कहाँ से अभी मैं ने उसे लिक्खा नहीं था थी पूरी शक्ल उस की याद मुझ को मगर मैं ने उसे देखा नहीं था बरहना ख़्वाब थे सूरज के नीचे किसी उम्मीद का पर्दा नहीं था है 'अमजद' आज तक वो शख़्स दिल में कि जो उस वक़्त भी मेरा नहीं था

Amjad Islam Amjad

0 likes

आईनों में अक्स न हों तो हैरत रहती है जैसे ख़ाली आँखों में भी वहशत रहती है हर दम दुनिया के हंगा में घेरे रखते थे जब से तेरे ध्यान लगे हैं फ़ुर्सत रहती है करनी है तो खुल के करो इंकार-ए-वफ़ा की बात बात अधूरी रह जाए तो हसरत रहती है शहर-ए-सुख़न में ऐसा कुछ कर इज़्ज़त बन जाए सब कुछ मिट्टी हो जाता है इज़्ज़त रहती है बनते बनते ढह जाती है दिल की हर तामीर ख़्वाहिश के बहरूप में शायद क़िस्मत रहती है साए लरज़ते रहते हैं शहरों की गलियों में रहते थे इंसान जहाँ अब दहशत रहती है मौसम कोई ख़ुशबू ले कर आते जाते हैं क्या क्या हम को रात गए तक वहशत रहती है ध्यान में मेला सा लगता है बीती यादों का अक्सर उस के ग़म से दिल की सोहबत रहती है फूलों की तख़्ती पर जैसे रंगों की तहरीर लौह-ए-सुख़न पर ऐसे 'अमजद' शोहरत रहती है

Amjad Islam Amjad

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Amjad Islam Amjad.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Amjad Islam Amjad's ghazal.