ghazalKuch Alfaaz

कहाँ हो तुम चले आओ मोहब्बत का तक़ाज़ा है ग़म-ए-दुनिया से घबरा कर तुम्हें दिल ने पुकारा है तुम्हारी बे-रुख़ी इक दिन हमारी जान ले लेगी क़सम तुम को ज़रा सोचो कि दस्तूर-ए-वफ़ा क्या है न जाने किस लिए दुनिया की नज़रें फिर गईं हम से तुम्हें देखा तुम्हें चाहा क़ुसूर इस के सिवा क्या है न है फ़रियाद होंटों पर न आँखों में कोई आँसू ज़माने से मिला जो ग़म उसे गीतों में गाया है

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे है वही अपना कि जो अपने से बेगाना रहे कुफ़्र से ये इल्तिजाएँ कर रहा हूँ बार बार जाऊँ तो का'बा मगर रुख़ सू-ए-मय-ख़ाना रहे शम-ए-सोज़ाँ कुछ ख़बर भी है तुझे ओ मस्त-ए-ग़म हुस्न-ए-महफ़िल है जभी जब तक कि परवाना रहे ज़ख़्म-ए-दिल ऐ ज़ख़्म-ए-दिल नासूर क्यूँँ बनता नहीं लुत्फ़ तो जब है कि अफ़्साने में अफ़्साना रहे हम को वाइज़ का भी दिल रखना है साक़ी का भी दिल हम तो तौबा कर के भी पाबंद-ए-मय-ख़ाना रहे आख़िरश कब तक रहेंगी हुस्न की नादानियाँ हुस्न से पूछो कि कब तक इश्क़ दीवाना रहे फ़ैज़-ए-राह-ए-इश्क़ है या फ़ैज़-ए-जज़्ब-ए-इश्क़ है हम तो मंज़िल पा के भी मंज़िल से बेगाना रहे मय-कदे में हम दुआएँ कर रहे हैं बार बार इस तरफ़ भी चश्म-ए-मस्त-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना रहे आज तो साक़ी से ये 'बहज़ाद' ने बाँधा है अहद लब पे तौबा हो मगर हाथों में पैमाना रहे

Behzad Lakhnavi

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मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है ख़लिश दिल में जहाँ पर थी वहीं मालूम होती है तिरे जल्वों से टकरा कर नहीं मालूम होती है नज़र भी एक मौज-ए-तह-नशीं मालूम होती है नुक़ूश-ए-पा के सदक़े बंदगी-इश्क़ के क़ुर्बां मुझे हर सम्त अपनी ही जबीं मालूम होती है मिरी रग रग में यूँँ तो दौड़ती है इश्क़ की बिजली कहीं ज़ाहिर नहीं होती कहीं मालूम होती है ये ए'जाज़-ए-नज़र कब है ये कब है हुस्न की काविश हसीं जो चीज़ होती है हसीं मालूम होती है उमीदें तोड़ दे मेरे दिल-ए-मुज़्तर ख़ुदा-हाफ़िज़ ज़बान-ए-हुस्न पर अब तक नहीं मालूम होती है उसे क्यूँँ मय-कदा कहता है बतला दे मिरे साक़ी यहाँ की सर-ज़मीं ख़ुल्द-ए-बरीं मालूम होती है अरे ऐ चारा-गर हाँ हाँ ख़लिश तू जिस को कहता है ये शय दिल में नहीं दिल के क़रीं मालूम होती है किसी के पा-ए-नाज़ुक पर झुकी है और नहीं उठती मुझे 'बहज़ाद' ये अपनी जबीं मालूम होती है

Behzad Lakhnavi

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इक बे-वफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया हम ने तो आह कुफ़्र को ईमाँ बना लिया दिल की ख़लिश-पसंदियाँ हैं कि अल्लाह की पनाह तीर-ए-नज़र को जान-ए-रग-ए-जाँ बना लिया मुझ को ख़बर नहीं मिरे दिल को ख़बर नहीं किस की नज़र ने बंदा-ए-एहसाँ बना लिया महसूस कर के हम ने मोहब्बत का हर अलम ख़्वाब-ए-सुबुक को ख़्वाब-ए-परेशाँ बना लिया दस्त-ए-जुनूँ की उक़्दा-कुशाई तो देखिए दामन को बे-नियाज़ गरेबाँ बना लिया तस्कीन-ए-दिल की हम ने भी परवाह छोड़ दी हर मौज-ए-ग़म को हासिल-ए-तूफ़ाँ बना लिया जब उन का नाम आ गया हम मुज़्तरिब हुए आहों को अपनी ज़ीस्त का उनवाँ बना लिया हम ने तो अपने दिल में वो ग़म हो कि हो अलम जो कोई आ गया उसे मेहमाँ बना लिया आईना देखने की ज़रूरत न थी कोई अपने को ख़ुद ही आप ने हैराँ बना लिया इक बे-वफ़ा पे कर के तसद्दुक़ दिल-ओ-जिगर 'बहज़ाद' हम ने ख़ुद को परेशाँ बना लिया

Behzad Lakhnavi

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दिल मेरा तेरा ताब-ए-फ़रमाँ है क्या करूँँ अब तेरा कुफ़्र ही मिरा ईमाँ है क्या करूँँ बा-होश हूँ मगर मिरा दामन है चाक चाक आलम ये देख देख के हैराँ है क्या करूँँ हर तरह का सुकून है हर तरह का है कैफ़ फिर भी ये मेरा क़ल्ब परेशाँ है क्या करूँँ कहता नहीं हूँ और ज़माना है बा-ख़बर चेहरे से दिल का हाल नुमायाँ है क्या करूँँ दामन करूँँ न चाक ये मुमकिन तो है मगर मुज़्तर हर एक तार-ए-गरेबाँ है क्या करूँँ सादा सा इक वरक़ हूँ किताब-ए-हयात का हसरत से अब न अब कोई अरमाँ है क्या करूँँ हर सम्त पा रहा हूँ वही रंग-ए-दिल-फ़रेब हाथों में कुफ़्र के मिरा ईमाँ है क्या करूँँ दाग़ों का क़ल्ब-ए-ज़ार से मुमकिन तो है इलाज उन के ही दम से दिल में चराग़ाँ है क्या करूँँ इक बे-वफ़ा के वास्ते से सब कुछ लुटा दिया 'बहज़ाद' अब न दीन न ईमाँ है क्या करूँँ

Behzad Lakhnavi

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ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला ज़हे-नसीब कि बंदे को मुद्दआ' न मिला निगाह-ए-शौक़ में बे-नूरियों का रंग बढ़ा निगाह-ए-शौक़ को जब कोई दूसरा न मिला हम अपनी बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पर निसार रहे ख़ुदी को ढूँढ़ लिया जब हमें ख़ुदा न मिला तुम्हारी बज़्म में लब खोल कर हुआ ख़ामोश वो बद-नसीब जिसे कोई आसरा न मिला हर एक ज़र्रे में मैं ख़ुद तो आ रहा था नज़र अजीब बात तुम्हारा कहीं पता न मिला बस इक सुकून ही हम को न मिल सका ता-उम्र वगरना तेरे तसद्दुक़ में हम को क्या न मिला तिरी निगाह-ए-मोहब्बत-नवाज़ ही की क़सम कि आज तक तो हमें तुझ सा दूसरा न मिला तिरा जमाल फ़ज़ाओं में मुंतशिर था मगर निगाह-ए-शौक़ को फिर भी तिरा पता न मिला हज़ार ठोकरें खाईं हज़ार सू 'बहज़ाद' जहान-ए-हुस्न में कोई भी बा-वफ़ा न मिला

Behzad Lakhnavi

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