ghazalKuch Alfaaz

मिरे लबों पे उसी आदमी की प्यास न हो जो चाहता है मिरे सामने गिलास न हो ये तिश्नगी तो मिली है हमें विरासत में हमारे वास्ते दरिया कोई उदास न हो तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस-पास न हो मुझे भी दुख है ख़ता हो गया निशाना तिरा कमान खींच मैं हाज़िर हूँ तू उदास न हो ग़ज़ल ही रह गई ताहिर-'फ़राज़' अपने लिए जहाँ में कोई ऐसा भी बे-असास न हो

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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छोड़ कर जाने का दस्तूर नहीं होता था कोई भी ज़ख़्म हो नासूर नहीं होता था मेरे भी होंठ पे सिगरेट नहीं होती थी उस की भी माँग में सिंदूर नहीं होता था औरतें प्यार में तब शौक़ नहीं रखती थी आदमी इश्क़ में मज़दूर नहीं होता था

Kushal Dauneria

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अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुई तुझ से मिलने की ऐ दरिया मजबूरी भी ख़त्म हुई कैसा प्यार कहाँ की उल्फ़त इश्क़ की बात तो जाने दो मेरे लिए अब उस के दिल से हमदर्दी भी ख़त्म हुई सामने वाली बिल्डिंग में अब काम है बस आराइश का कल तक जो मिलती थी हमें वो मज़दूरी भी ख़त्म हुई जेल से वापस आ कर उस ने पांचों वक़्त नमाज़ पढ़ी मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई जिस की जल-धारा से बस्ती वाले जीवन पाते थे रस्ता बदलते ही नद्दी के वो बस्ती भी ख़त्म हुई

Tahir Faraz

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कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा मुझ को पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा पलकों पे उस की जले बुझेंगे जुगनू जब मिरी यादों के कमरे में होंगी बरसातें घर जंगल हो जाएगा जिस दिन उस की ज़ुल्फ़ें उस के शानों पर खुल जाएँगी उस दिन शर्म से पानी पानी ख़ुद बादल हो जाएगा जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे आँखों का ये मेला पानी गंगा-जल हो जाएगा उस की यादें उस की बातें उस की वफ़ाएँ उस का प्यार किस को ख़बर थी जीना मुश्किल एक इक पल हो जाएगा मत घबरा ऐ प्यासे दरिया सूरज आने वाला है बर्फ़ पहाड़ों से पिघली तो जल ही जल हो जाएगा

Tahir Faraz

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आप हमारे साथ नहीं चलिए कोई बात नहीं आप किसी के हो जाएँ आप के बस की बात नहीं अब हम को आवाज़ न दो अब ऐसे हालात नहीं इस दुनिया के नक़्शे में शहर तो हैं देहात नहीं सब है गवारा हम को मगर तौहीन-ए-जज़्बात नहीं हम को मिटाना मुश्किल है सदियाँ हैं लम्हात नहीं ज़ालिम से डरने वाले क्या तेरे दो हाथ नहीं

Tahir Faraz

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जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी

Tahir Faraz

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में न कहता था कि शहरों में न जा यार मिरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा यार मिरे कोई टूटे हुए ख़्वाबों से कहाँ मिलता है हर जगह दर्द का बिस्तर न लगा यार मिरे सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मिरे अपनी चाहत के शब-ओ-रोज़ मुकम्मल कर ले जा ये सूरज भी तिरे नाम किया यार मिरे तुझ से मिलता हूँ तो रिश्ता कोई याद आता है सिलसिला मुझ से ज़ियादा न बढ़ा यार मिरे ऐसा लगता है कि कुछ टूट रहा है मुझ में छोड़ के तू मुझे इस वक़्त न जा यार मिरे ख़ुश-नसीबी से ये साअ'त तिरे हाथ आई है आसमाँ झुकने लगा हाथ बढ़ा यार मिरे

Tahir Faraz

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