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mohabbat karne vaale kam na honge tiri mahfil men lekin ham na honge those that love you will not shrink but i will be gone i think main aksar sochta huun phuul kab tak sharik-e-girya-e-shabnam na honge ---- ---- zara der-ashna chashm-e-karam hai sitam hi ishq men paiham na honge ---- ---- dilon ki uljhanen badhti rahengi agar kuchh mashvare baham na honge hearts confusion will result if mutually we don’t consult zamane bhar ke ghham ya ik tira ghham ye ghham hoga to kitne ghham na honge your sorrow or a world of pain if this be there none will remain kahun bedard kyuun ahl-e-jahan ko vo mere haal se mahram na honge ---- ---- hamare dil men sail-e-girya hoga agar ba-dida-e-pur-nam na honge ---- ---- agar tu ittifaqan mil bhi jaae tiri furqat ke sadme kam na honge even if perchance we meet my ache for you will not deplete 'hafiz' un se main jitna bad-guman huun vo mujh se us qadar barham na honge when so upset with her be will she not be annoyed with me mohabbat karne wale kam na honge teri mahfil mein lekin hum na honge those that love you will not shrink but i will be gone i think main aksar sochta hun phul kab tak sharik-e-girya-e-shabnam na honge ---- ---- zara der-ashna chashm-e-karam hai sitam hi ishq mein paiham na honge ---- ---- dilon ki uljhanen badhti rahengi agar kuchh mashware baham na honge hearts confusion will result if mutually we don’t consult zamane bhar ke gham ya ek tera gham ye gham hoga to kitne gham na honge your sorrow or a world of pain if this be there none will remain kahun bedard kyun ahl-e-jahan ko wo mere haal se mahram na honge ---- ---- hamare dil mein sail-e-girya hoga agar ba-dida-e-pur-nam na honge ---- ---- agar tu ittifaqan mil bhi jae teri furqat ke sadme kam na honge even if perchance we meet my ache for you will not deplete 'hafiz' un se main jitna bad-guman hun wo mujh se us qadar barham na honge when so upset with her be will she not be annoyed with me

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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यहाँ तुम देखना रुतबा हमारा हमारी रेत है दरिया हमारा किसी से कल पिताजी कह रहे थे मुहब्बत खा गई लड़का हमारा तअ'ल्लुक़ ख़त्म करने जा रही है कहीं गिरवा न दे बच्चा हमारा

Kushal Dauneria

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आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोल कर देखा किए एक ही लम्हे में जैसे उम्र-भर देखा किए दिल अगर बेताब है दिल का मुक़द्दर है यही जिस क़दर थी हम को तौफ़ीक़-ए-नज़र देखा किए ख़ुद-फ़रोशाना अदा थी मेरी सूरत देखना अपने ही जल्वे ब-अंदाज़-ए-दिगर देखा किए ना-शनास-ए-ग़म फ़क़त दाद-ए-हुनर देते रहे हम मता-ए-ग़म को रुस्वा-ए-हुनर देखा किए देखने का अब ये आलम है कोई हो या न हो हम जिधर देखा किए पहरों उधर देखा किए हुस्न को देखा है मैं ने हुस्न की ख़ातिर 'हफ़ीज़' वर्ना सब अपना ही मेयार-ए-नज़र देखा किए

Hafeez Hoshiarpuri

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लफ़्ज़ अभी ईजाद होंगे हर ज़रूरत के लिए शरह-ए-राहत के लिए ग़म की सराहत के लिए अब मिरा चुप-चाप रहना अम्र-ए-मजबूरी सही मैं ने खोली ही ज़बाँ कब थी शिकायत के लिए मेरे चश्म-ओ-गोश-ओ-लब से पूछ लो सब कुछ यहीं मुझ को मेरे सामने लाओ शहादत के लिए सख़्त-कोशी सख़्त-जानी की तरफ़ लाई मुझे मुझ को ये फ़ुर्सत ग़नीमत है अलालत के लिए ऑक्सीजन से शबिस्तान-ए-अनासिर ताबनाक मुज़्तरिब हर ज़ी-नफ़स उस की रिफ़ाक़त के लिए मर गए कुछ लोग जीने का मुदावा सोच कर और कुछ जीते रहे जीने की आदत के लिए आह मर्ग-ए-आदमी पर आदमी रोए बहुत कोई भी रोया न मर्ग-ए-आदमियत के लिए कोई मौक़ा ज़िंदगी का आख़िरी मौक़ा नहीं इस क़दर ताजील क्यूँ रफ़-ए-कुदूरत के लिए इस्तक़ामत ऐ मिरे दैर-आश्ना-ए-ग़म-गुसार एक आँसू है बहुत हुस्न-ए-नदामत के लिए कोई 'नासिर' की ग़ज़ल कोई ज़फ़र की मय-तरंग चाहिए कुछ तो मिरी शाम-ए-अयादत के लिए गुलशन-आबाद-ए-जहाँ में सूरत-ए-शबनम 'हफ़ीज़' हम अगर रोए भी तो रोने की फ़ुर्सत के लिए

Hafeez Hoshiarpuri

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कुछ इस तरह से नज़र से गुज़र गया कोई कि दिल को ग़म का सज़ा-वार कर गया कोई दिल-ए-सितम-ज़दा को जैसे कुछ हुआ ही नहीं ख़ुद अपने हुस्न से यूँँ बे-ख़बर गया कोई वो एक जल्वा-ए-सद-रंग इक हुजूम-ए-बहार न जाने कौन था जाने किधर गया कोई नज़र कि तिश्ना-ए-दीदार थी रही महरूम नज़र उठाई तो दिल में उतर गया कोई निगाह-ए-शौक़ की महरूमियों से ना-वाक़िफ़ निगाह-ए-शौक़ पे इल्ज़ाम धर गया कोई अब उन के हुस्न में हुस्न-ए-नज़र भी शामिल है कुछ और मेरी नज़र से सँवर गया कोई किसी के पाँव की आहट कि दिल की धड़कन थी हज़ार बार उठा सू-ए-दर गया कोई नसीब-ए-अहल-ए-वफ़ा ये सुकून-ए-दिल तो न था ज़रूर नाला-ए-दिल बे-असर गया कोई उठा फिर आज मिरे दिल में रश्क का तूफ़ाँ फिर उन की राह से बा-चश्म-ए-तर गया कोई ये कह के याद करेंगे 'हफ़ीज़' दोस्त मुझे वफ़ा की रस्म को पाइंदा कर गया कोई

Hafeez Hoshiarpuri

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नर्गिस पे तो इल्ज़ाम लगा बे-बसरी का अरबाब-ए-गुलिस्ताँ पे नहीं कम-नज़री का तौफ़ीक़-ए-रिफ़ाक़त नहीं उन को सर-ए-मंज़िल रस्ते में जिन्हें पास रहा हम-सफ़री का अब ख़ानका ओ मदरसा ओ मय-कदा हैं एक इक सिलसिला है क़ाफ़िला-ए-बे-ख़बरी का हर नक़्श है आईना-ए-नैरंग-ए-तमाशा दुनिया है कि हासिल मिरी हैराँ-नज़री का अब फ़र्श से ता-अर्श ज़बूँ-हाल है फ़ितरत इक म'अरका दर-पेश है अज़्म-ए-बशरी का कब मिलती है ये दौलत-ए-बेदार किसी को और मैं हूँ कि रोना है इसी दीदा-वरी का बे-वासता-ए-इश्क़ भी रंग-ए-रुख़-ए-परवेज़ उनवान है फ़रहाद की ख़ूनीं-जिगरी का आख़िर तिरे दर पे मुझे ले आई मोहब्बत देखा न गया हाल मिरी दर-बदरी का दिल में हो फ़क़त तुम ही तुम आँखों पे न जाओ आँखों को तो है रोग परेशाँ-नज़री का बे-पैरवी-ए-'मीर' 'हफ़ीज़' अपनी रविश है हम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कम-हुनरी का

Hafeez Hoshiarpuri

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तमाम उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया इस इंतिज़ार में किस किस से प्यार हम ने किया तलाश-ए-दोस्त को इक उम्र चाहिए ऐ दोस्त कि एक उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया तेरे ख़याल में दिल शादमाँ रहा बरसों तिरे हुज़ूर उसे सोगवार हम ने किया ये तिश्नगी है के उन से क़रीब रह कर भी 'हफ़ीज़' याद उन्हें बार बार हम ने किया

Hafeez Hoshiarpuri

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