ghazalKuch Alfaaz

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे मुक़द्दर में चलना था चलते रहे मिरे रास्तों में उजाला रहा दिए उस की आँखों में जलते रहे कोई फूल सा हाथ काँधे पे था मिरे पाँव शो'लों पे जलते रहे सुना है उन्हें भी हवा लग गई हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे वो क्या था जिसे हम ने ठुकरा दिया मगर उम्र भर हाथ मलते रहे मोहब्बत अदावत वफ़ा बे-रुख़ी किराए के घर थे बदलते रहे लिपट कर चराग़ों से वो सो गए जो फूलों पे करवट बदलते रहे

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा

Bashir Badr

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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है

Bashir Badr

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शाम आँखों में आँख पानी में और पानी सरा-ए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दिए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जाएगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँडूँ आग में ख़ाक में कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं भी हूँ रवानी में

Bashir Badr

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इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को अब भी ये क़ुदरत कहाँ है आदमी की ज़ात को जिन का सारा जिस्म होता है हमारी ही तरह फूल कुछ ऐसे भी खिलते हैं हमेशा रात को एक इक कर के सभी कपड़े बदन से गिर चुके सुब्ह फिर हम ये कफ़न पहनाएँगे जज़्बात को पीछे पीछे रात थी तारों का इक लश्कर लिए रेल की पटरी पे सूरज चल रहा था रात को आब ओ ख़ाक ओ बा'द में भी लहर वो आ जाए है सुर्ख़ कर देती है दम भर में जो पीली धात को सुब्ह बिस्तर बंद है जिस में लिपट जाते हैं हम इक सफ़र के बा'द फिर खुलते हैं आधी रात को सर पे सूरज के हमारे प्यार का साया रहे मामता का जिस्म माँगे ज़िंदगी की बात को

Bashir Badr

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सौ ख़ुलूस बातों में सब करम ख़यालों में बस ज़रा वफ़ा कम है तेरे शहर वालों में पहली बार नज़रों ने चाँद बोलते देखा हम जवाब क्या देते खो गए सवालों में रात तेरी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा जैसे कोई चुटकी ले नर्म नर्म गालों में यूँँ किसी की आँखों में सुब्ह तक अभी थे हम जिस तरह रहे शबनम फूल के प्यालों में मेरी आँख के तारे अब न देख पाओगे रात के मुसाफ़िर थे खो गए उजालों में जैसे आधी शब के बा'द चाँद नींद में चौंके वो गुलाब की जुम्बिश उन सियाह बालों में

Bashir Badr

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