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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

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क्या करोगे मेरा जादू चल गया तो हफ़्ते भर में उस को पागल कर दिया तो बोलना अगली दफ़ा तलवार उठेगी ग़लती से भी उस के ऊपर हाथ उठा तो बद्दुआऍं मरने की दे तो रही हो और कहीं मैं सच में इस से मर गया तो जी मुझे दरअस्ल अच्छे लगते हो आप उस ने मेरी बात सुन कर के कहा तो

Kushal Dauneria

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लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है एक खिड़की तिरी आमद की दुआ करती है सिलवटें चीख़ती रहती हैं मिरे बिस्तर की करवटों में ही मिरी रात कटा करती है वक़्त थम जाता है अब रात गुज़रती ही नहीं जाने दीवार-घड़ी रात में क्या करती है चाँद खिड़की में जो आता था नहीं आता अब तीरगी चारों तरफ़ रक़्स किया करती है मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है

Abbas Qamar

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ किसी काम में जो न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँँ कोई आ के शम्अ'' जलाए क्यूँँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का हबीब हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का रक़ीब हूँ जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ

Muztar Khairabadi

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