ghazalKuch Alfaaz

sar jhukaoge to patthar devta ho jaega itna mat chaho use vo bevafa ho jaega ham bhi dariya hain hamen apna hunar malum hai jis taraf bhi chal padenge rasta ho jaega kitni sachchai se mujh se zindagi ne kah diya tu nahin mera to koi dusra ho jaega main khuda ka naam le kar pi raha huun dosto zahr bhi is men agar hoga dava ho jaega sab usi ke hain hava khushbu zamin o asman main jahan bhi jaunga us ko pata ho jaega sar jhukaoge to patthar dewta ho jaega itna mat chaho use wo bewafa ho jaega hum bhi dariya hain hamein apna hunar malum hai jis taraf bhi chal padenge rasta ho jaega kitni sachchai se mujh se zindagi ne kah diya tu nahin mera to koi dusra ho jaega main khuda ka nam le kar pi raha hun dosto zahr bhi is mein agar hoga dawa ho jaega sab usi ke hain hawa khushbu zamin o aasman main jahan bhi jaunga us ko pata ho jaega

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है

Bashir Badr

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जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है यादों के दरीचों में चिलमन सी सरकती है लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख जाए यूँँ याद तिरी शब भर सीने में सुलगती है यूँँ प्यार नहीं छुपता पलकों के झुकाने से आँखों के लिफ़ाफ़ों में तहरीर चमकती है ख़ुश-रंग परिंदों के लौट आने के दिन आए बिछड़े हुए मिलते हैं जब बर्फ़ पिघलती है शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

Bashir Badr

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सुब्ह का झरना हमेशा हँसने वाली औरतें झुट-पुटे की नद्दियाँ ख़ामोश गहरी औरतें मो'तदिल कर देती हैं ये सर्द मौसम का मिज़ाज बर्फ़ के टीलों पे चढ़ती धूप जैसी औरतें सब्ज़ नारंजी सुनहरी खट्टी मीठी लड़कियाँ भारी जिस्मों वाली टपके आम जैसी औरतें सड़कों बाज़ारों मकानों दफ़्तरों में रात दिन लाल नीली सब्ज़ नीली जलती बुझती औरतें शहर में इक बाग़ है और बाग़ में तालाब है तैरती हैं इस में सातों रंग वाली औरतें सैकड़ों ऐसी दुकानें हैं जहाँ मिल जाएँगी धात की पत्थर की शीशे की रबड़ की औरतें मुंजमिद हैं बर्फ़ में कुछ आग के पैकर अभी मक़बरों की चादरें हैं फूल जैसी औरतें उन के अंदर पक रहा है वक़्त का आतिश-फ़िशाँ जिन पहाड़ों को ढके हैं बर्फ़ जैसी औरतें आँसुओं की तरह तारे गिर रहे हैं अर्श से रो रही हैं आसमानों की अकेली औरतें ग़ौर से सूरज निकलते वक़्त देखो आसमाँ चूमती हैं किस का माथा उजली लंबी औरतें सब्ज़ सोने के पहाड़ों पर क़तार-अंदर-क़तार सर से सर जोड़े खड़ी हैं लंबी सीधी औरतें वाक़ई दोनों बहुत मज़लूम हैं नक़्क़ाद और माँ कहे जाने की हसरत में सुलगती औरतें

Bashir Badr

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इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को अब भी ये क़ुदरत कहाँ है आदमी की ज़ात को जिन का सारा जिस्म होता है हमारी ही तरह फूल कुछ ऐसे भी खिलते हैं हमेशा रात को एक इक कर के सभी कपड़े बदन से गिर चुके सुब्ह फिर हम ये कफ़न पहनाएँगे जज़्बात को पीछे पीछे रात थी तारों का इक लश्कर लिए रेल की पटरी पे सूरज चल रहा था रात को आब ओ ख़ाक ओ बा'द में भी लहर वो आ जाए है सुर्ख़ कर देती है दम भर में जो पीली धात को सुब्ह बिस्तर बंद है जिस में लिपट जाते हैं हम इक सफ़र के बा'द फिर खुलते हैं आधी रात को सर पे सूरज के हमारे प्यार का साया रहे मामता का जिस्म माँगे ज़िंदगी की बात को

Bashir Badr

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दिल में इक तस्वीर छुपी थी आन बसी है आँखों में शायद हम ने आज ग़ज़ल सी बात लिखी है आँखों में जैसे इक हरीजन लड़की मंदिर के दरवाज़े पर शाम दियों की थाल सजाए झाँक रही है आँखों में इस रूमाल को काम में लाओ अपनी पलकें साफ़ करो मैला मैला चाँद नहीं है धूल जमी है आँखों में पढ़ता जा ये मंज़र-नामा ज़र्द अज़ीम पहाड़ों का धूप खिली पलकों के ऊपर बर्फ़ जमी है आँखों में मैं ने इक नॉवेल लिक्खा है आने वाली सुब्ह के नाम कितनी रातों का जागा हूँ नींद भरी है आँखों में

Bashir Badr

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