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शाम से आँख में नमी सी है आज फिर आप की कमी सी है दफ़्न कर दो हमें कि साँस आए नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है कौन पथरा गया है आँखों में बर्फ़ पलकों पे क्यूँँ जमी सी है वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर आदत इस की भी आदमी सी है आइए रास्ते अलग कर लें ये ज़रूरत भी बाहमी सी है

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तिनका तिनका काँटे तोड़े सारी रात कटाई की क्यूँँ इतनी लंबी होती है चाँदनी रात जुदाई की नींद में कोई अपने-आप से बातें करता रहता है काल-कुएँ में गूँजती है आवाज़ किसी सौदाई की सीने में दिल की आहट जैसे कोई जासूस चले हर साए का पीछा करना आदत है हरजाई की आँखों और कानों में कुछ सन्नाटे से भर जाते हैं क्या तुम ने उड़ती देखी है रेत कभी तन्हाई की तारों की रौशन फ़सलें और चाँद की एक दरांती थी साहू ने गिरवी रख ली थी मेरी रात कटाई की

Gulzar

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ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें शम्अ''' जलती है तो लाज़िम है शुआएँ निकलें वक़्त की ज़र्ब से कट जाते हैं सब के सीने चाँद का छलका उतर जाए तो क़ाशें निकलें दफ़्न हो जाएँ कि ज़रख़ेज़ ज़मीं लगती है कल इसी मिट्टी से शायद मिरी शाख़ें निकलें चंद उम्मीदें निचोड़ी थीं तो आहें टपकीं दिल को पिघलाएँ तो हो सकता है साँसें निकलें ग़ार के मुँह पे रखा रहने दो संग-ए-ख़ुर्शीद ग़ार में हाथ न डालो कहीं रातें निकलें

Gulzar

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हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए दो दिन की ज़िंदगी में हज़ारों बरस जिए सदियों पे इख़्तियार नहीं था हमारा दोस्त दो चार लम्हे बस में थे दो चार बस जिए सहरा के उस तरफ़ से गए सारे कारवाँ सुन सुन के हम तो सिर्फ़ सदा-ए-जरस जिए होंटों में ले के रात के आँचल का इक सिरा आँखों पे रख के चाँद के होंटों का मस जिए महदूद हैं दुआएँ मिरे इख़्तियार में हर साँस पुर-सुकून हो तू सौ बरस जिए

Gulzar

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तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए हसरतें अपनी बिलक्तीं न यतीमों की तरह हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुन कर मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए

Gulzar

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कोई अटका हुआ है पल शायद वक़्त में पड़ गया है बल शायद लब पे आई मिरी ग़ज़ल शायद वो अकेले हैं आज-कल शायद दिल अगर है तो दर्द भी होगा इस का कोई नहीं है हल शायद जानते हैं सवाब-ए-रहम-ओ-करम उन से होता नहीं अमल शायद आ रही है जो चाप क़दमों की खिल रहे हैं कहीं कँवल शायद राख को भी कुरेद कर देखो अभी जलता हो कोई पल शायद चाँद डूबे तो चाँद ही निकले आप के पास होगा हल शायद

Gulzar

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