shab-e-visal men duuri ka khvab kyuun aaya kamal-e-fath men ye dar ka baab kyuun aaya dilon men ab ke baras itne vahm kyuun jaage bilad-e-sabr men ab iztirab kyuun aaya hai aag gul pe ajab is bahar-e-guzran men chaman men ab ke gul-e-be-hisab kyuun aaya agar vahi tha to rukh pe vo be-rukhi kya thi zara se hijr men ye inqalab kyuun aaya bas ek hoga tamasha tamam samton par miri sada ke safar men sarab kyuun aaya main khush nahin huun bahut duur us se hone par jo main nahin tha to us par shabab kyuun aaya uda hai shola-e-barq abr ki fasilon par ye is bala ke muqabil sahab kyuun aaya yaqin kis liye us par se uth gaya hai 'munir' tumhare sar pe ye shak ka azaab kyuun aaya shab-e-visal mein duri ka khwab kyun aaya kamal-e-fath mein ye dar ka bab kyun aaya dilon mein ab ke baras itne wahm kyun jage bilad-e-sabr mein ab iztirab kyun aaya hai aag gul pe ajab is bahaar-e-guzran mein chaman mein ab ke gul-e-be-hisab kyun aaya agar wahi tha to rukh pe wo be-rukhi kya thi zara se hijr mein ye inqalab kyun aaya bas ek hoga tamasha tamam samton par meri sada ke safar mein sarab kyun aaya main khush nahin hun bahut dur us se hone par jo main nahin tha to us par shabab kyun aaya uda hai shola-e-barq abr ki fasilon par ye is bala ke muqabil sahab kyun aaya yaqin kis liye us par se uth gaya hai 'munir' tumhaare sar pe ye shak ka azab kyun aaya
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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बे-ख़याली में यूँँ ही बस इक इरादा कर लिया अपने दिल के शौक़ को हद से ज़ियादा कर लिया जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं उस ने वा'दा कर लिया मैं ने भी वा'दा कर लिया ग़ैर से नफ़रत जो पा ली ख़र्च ख़ुद पर हो गई जितने हम थे हम ने ख़ुद को उस से आधा कर लिया शाम के रंगों में रख कर साफ़ पानी का गिलास आब-ए-सादा को हरीफ़-ए-रंग-ए-बादा कर लिया हिजरतों का ख़ौफ़ था या पुर-कशिश कोहना मक़ाम क्या था जिस को हम ने ख़ुद दीवार-ए-जादा कर लिया एक ऐसा शख़्स बनता जा रहा हूँ मैं 'मुनीर' जिस ने ख़ुद पर बंद हुस्न ओ जाम-ओ-बादा कर लिया
Muneer Niyazi
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हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया ये इक झलक का तमाशा जिगर जला भी गया उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया चलो 'मुनीर' चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया
Muneer Niyazi
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ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या
Muneer Niyazi
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