siskiyan leti hui ghhamgin havao chup raho so rahe hain dard un ko mat jagao chup raho raat ka patthar na pighlega shuaon ke baghhair subh hone tak na bolo ham-navao chup raho band hain sab mai-kade saaqi bane hain mohtasib ai garajti gunjti kaali ghatao chup raho tum ko hai malum akhir kaun sa mausam hai ye fasl-e-gul aane talak ai khush-navao chup raho soch ki divar se lag kar hain ghham baithe hue dil men bhi naghhma na koi gungunao chup raho chhat gae halat ke badal to dekha jaega vaqt se pahle andhere men na jaao chup raho dekh lena ghar se niklega na ham-saya koi ai mire yaaro mire dard-ashnao chup raho kyuun sharik-e-ghham banate ho kisi ko ai 'qatil' apni suuli apne kandhe par uthao chup raho siskiyan leti hui ghamgin hawao chup raho so rahe hain dard un ko mat jagao chup raho raat ka patthar na pighlega shuaon ke baghair subh hone tak na bolo ham-nawao chup raho band hain sab mai-kade saqi bane hain mohtasib ai garajti gunjti kali ghatao chup raho tum ko hai malum aakhir kaun sa mausam hai ye fasl-e-gul aane talak ai khush-nawao chup raho soch ki diwar se lag kar hain gham baithe hue dil mein bhi naghma na koi gungunao chup raho chhat gae haalat ke baadal to dekha jaega waqt se pahle andhere mein na jao chup raho dekh lena ghar se niklega na ham-saya koi ai mere yaro mere dard-ashnao chup raho kyun sharik-e-gham banate ho kisi ko ai 'qatil' apni suli apne kandhe par uthao chup raho
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
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सो रहेंगे के जागते रहेंगे हम तेरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कही और ही ढूंढता रहेंगा हम कही और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे सभी मौसम है दस्तरस में तेरी तू ने चाहा तो हम हरे रहेंगे लौटना कब है तू ने पर तुझ को आदतन ही पुकारते रहेंगे तुझ को पाने में मसअला ये है तुझ को खोने के वसवसे रहेंगे तू इधर देख मुझ सेे बातें कर यार चश्में तो फूटते रहेंगे एक मुद्दत हुई है तुझ सेे मिले तू तो कहता था राब्ते रहेंगे
Tehzeeb Hafi
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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
Bashir Badr
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किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम
Ahmad Faraz
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तितलियों का रंग हो या झूमते बादल का रंग हम ने हर इक रंग को जाना तिरे आँचल का रंग तेरी आँखों की चमक है या सितारों की ज़िया रात का है घुप अँधेरा या तिरे काजल का रंग धड़कनों के ताल पर वो हाल अपने दिल का है जैसे गोरी के थिरकते पाँव में पायल का रंग फेंकना तुम सोच कर लफ़्ज़ों का ये कड़वा गुलाल फैल जाता है कभी सदियों पे भी इक पल का रंग आह ये रंगीन मौसम ख़ून की बरसात का छा रहा है अक़्ल पर जज़्बात की हलचल का रंग अब तो शबनम का हर इक मोती है कंकर की तरह हाँ उसी गुलशन पे छाया था कभी मख़मल का रंग फिर रहे हैं लोग हाथों में लिए ख़ंजर खुले कूचे कूचे में अब आता है नज़र मक़्तल का रंग चार जानिब जिस की रा'नाई के चर्चे हैं 'क़तील' जाने कब देखेंगे हम उस आने वाली कल का रंग
Qateel Shifai
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अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ कोई आँसू तेरे दामन पर गिरा कर बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ थक गया मैं करते करते याद तुझ को अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा रौशनी को, घर जलाना चाहता हूँ आख़िरी हिचकी तिरे ज़ानू पे आए मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ
Qateel Shifai
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खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना ब-नाम-ए-अज़्मत-ए-किरदार आओ सच बोलें सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें बजा कि ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं कहाँ के हम भी वफ़ादार आओ सच बोलें जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँँ करें किसी में तलाश अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के नज़र है आइना-बरदार आओ सच बोलें 'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें
Qateel Shifai
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राब्ता लाख सही क़ाफ़िला-सालार के साथ हम को चलना है मगर वक़्त की रफ़्तार के साथ ग़म लगे रहते हैं हर आन ख़ुशी के पीछे दुश्मनी धूप की है साया-ए-दीवार के साथ किस तरह अपनी मोहब्बत की मैं तकमील करूँँ ग़म-ए-हस्ती भी तो शामिल है ग़म-ए-यार के साथ लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम बदल जाता है इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ दुश्मनी मुझ से किए जा मगर अपना बन कर जान ले ले मिरी सय्याद मगर प्यार के साथ दो घड़ी आओ मिल आएँ किसी 'ग़ालिब' से 'क़तील' हज़रत 'ज़ौक़' तो वाबस्ता हैं दरबार के साथ
Qateel Shifai
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परेशां रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ हंसो और हंसते-हंसते डूबते जाओ ख़लाओं में हमीं पे रात भारी है सितारो तुम तो सो जाओ हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा यही क़िस्मत हमारी है सितारो तुम तो सो जाओ तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया ये बाज़ी हम ने हारी है सितारो तुम तो सो जाओ कहे जाते हो रो रो कर हमारा हाल दुनिया से ये कैसी राज़दारी है सितारो तुम तो सो जाओ हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ
Qateel Shifai
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