اونو آویں تو پردے سے گھڑی بھر بھار بیٹھوں گی بہانا کر کے موتیاں کے پروتے ہار بیٹھوں گی اونو یاں آو کیں گے تو کہوں گی کام کرتی ہوں اٹھلتی ہور مٹھلتی چپ گھڑی دوچار بیٹھوں گی نزک میں دوڑ جانے کوں خوشی ہوں چپ اچھل رہوں گی ولے لوگاں میں دکھلانے کو ہو بیزار بیٹھوں گی پکڑ کر ہاتھ پردے میں لیجاویں گے تو جھڑکوں گی گھنگھٹ میں مکھ چپا کرٹک میں تڑکا مار بیٹھوں گی بلایاں جیوں کے جیوں میں لے پڑوں گی پاؤں میں دل سوں ولے ظاہر میں دکھلانے کو ہو اغیار بیٹھوں گی کروں گی ظاہرانہ چپ غصہ اور مان ہٹ لیکن سریجن پرتے جیو اپنا میں جیو میں وار بیٹھوں گی کتی بیزاری دیتے ووئی جو بیٹھی تو نزک آکر مجھے سو گند جو آکر یوں دسری بار بیٹھوں گی کنے کو چپ کتی ہوں میں ولے یوں جی میں گھٹ کی یوں نزک ہو ہاشمی کے مل میں آٹھوں پھار بیٹھوں گی
Related Ghazal
बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे
Kumar Vishwas
56 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
235 likes
एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है धूप आँगन में फैल जाती है रंग-ए-मौसम है और बाद-ए-सबा शहर कूचों में ख़ाक उड़ाती है फ़र्श पर काग़ज़ उड़ते फिरते हैं मेज़ पर गर्द जमती जाती है सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर अब किसे रात भर जगाती है मैं भी इज़्न-ए-नवा-गरी चाहूँ बे-दिली भी तो लब हिलाती है सो गए पेड़ जाग उठी ख़ुश्बू ज़िंदगी ख़्वाब क्यूँँ दिखाती है उस सरापा वफ़ा की फ़ुर्क़त में ख़्वाहिश-ए-ग़ैर क्यूँँ सताती है आप अपने से हम-सुख़न रहना हम-नशीं साँस फूल जाती है क्या सितम है कि अब तिरी सूरत ग़ौर करने पे याद आती है कौन इस घर की देख-भाल करे रोज़ इक चीज़ टूट जाती है
Jaun Elia
32 likes
किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
95 likes
Similar Writers
Our suggestions based on ہاشمی بیجاپوری.
Similar Moods
More moods that pair well with ہاشمی بیجاپوری's ghazal.







