ghazalKuch Alfaaz

us ki ankhon men utar jaane ko ji chahta hai shaam hoti hai to ghar jaane ko ji chahta hai kisi kam-zarf ko ba-zarf agar kahna pade aise jiine se to mar jaane ko ji chahta hai ek ik baat men sachchai hai us ki lekin apne va'don se mukar jaane ko ji chahta hai qarz tuute hue khvabon ka ada ho jaae zaat men apni bikhar jaane ko ji chahta hai apni palkon pe sajae hue yadon ke diye us ki nindon se guzar jaane ko ji chahta hai ek ujde hue viran khandar men 'azar' na-munasib hai magar jaane ko ji chahta hai us ki aankhon mein utar jaane ko ji chahta hai sham hoti hai to ghar jaane ko ji chahta hai kisi kam-zarf ko ba-zarf agar kahna pade aise jine se to mar jaane ko ji chahta hai ek ek baat mein sachchai hai us ki lekin apne wa'don se mukar jaane ko ji chahta hai qarz tute hue khwabon ka ada ho jae zat mein apni bikhar jaane ko ji chahta hai apni palkon pe sajae hue yaadon ke diye us ki nindon se guzar jaane ko ji chahta hai ek ujde hue viran khandar mein 'azar' na-munasib hai magar jaane ko ji chahta hai

Related Ghazal

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

190 likes

पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

158 likes

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

More from Kafeel Aazar Amrohvi

आज मैं ने उसे नज़दीक से जा देखा है वो दरीचा तो मिरे क़द से बहुत ऊँचा है अपने कमरे को अँधेरों से भरा पाया है तेरे बारे में कभी ग़ौर से जब सोचा है हर तमन्ना को रिवायत की तरह तोड़ा है तब कहीं जा के ज़माना मुझे रास आया है तुम को शिकवा है मिरे अहद-ए-मोहब्बत से मगर तुम ने पानी पे कोई लफ़्ज़ कभी लिक्खा है ऐसा बिछड़ा कि मिला ही नहीं फिर उस का पता हाए वो शख़्स जो अक्सर मुझे याद आता है कोई उस शख़्स को अपना नहीं कहता 'आज़र' अपने घर में भी वो ग़ैरों की तरह रहता है

Kafeel Aazar Amrohvi

1 likes

उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है किसी कम-ज़र्फ़ को बा-ज़र्फ़ अगर कहना पड़े ऐसे जीने से तो मर जाने को जी चाहता है एक इक बात में सच्चाई है उस की लेकिन अपने वा'दों से मुकर जाने को जी चाहता है क़र्ज़ टूटे हुए ख़्वाबों का अदा हो जाए ज़ात में अपनी बिखर जाने को जी चाहता है अपनी पलकों पे सजाए हुए यादों के दिए उस की नींदों से गुज़र जाने को जी चाहता है एक उजड़े हुए वीरान खंडर में 'आज़र' ना-मुनासिब है मगर जाने को जी चाहता है

Kafeel Aazar Amrohvi

12 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Kafeel Aazar Amrohvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Kafeel Aazar Amrohvi's ghazal.