ghazalKuch Alfaaz

उतरा उतरा तो यूँँ चेहरा न घड़ी का होता ज़ाइक़ा वक़्त का थोड़ा भी जो मीठा होता रात इक रोज़ तो मेले में निकलती अपने चाँद इक शाम तो पानी का बताशा होता तब मुझे सब ही समझते तिरा जोगी जानाँ मेरे माथे पे अगर हिज्र का टीका होता

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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तुम सर्वत को पढ़ती हो कितनी अच्छी लड़की हो बात नहीं सुनती हो क्यूँँ ग़ज़लें भी तो सुनती हो क्या रिश्ता है शामों से सूरज की क्या लगती हो लोग नहीं डरते रब से तुम लोगों से डरती हो मैं तो जीता हूँ तुम में तुम क्यूँँ मुझ पे मरती हो आदम और सुधर जाए तुम भी हद ही करती हो किस ने जींस करी ममनूअ' पहनो अच्छी लगती हो

Ali Zaryoun

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यूँ मैं दिल का ख़याल रखता हूँ इस में तेरा ख़याल रखता हूँ तेरी मर्ज़ी का भी ख़याल नहीं तेरा इतना ख़याल रखता हूँ और मर जाता है वही बीमार जिस का अच्छा ख़याल रखता हूँ तुझ को फिर भी ख़राब होना है फिर भी तेरा ख़याल रखता हूँ

Swapnil Tiwari

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वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ

Swapnil Tiwari

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ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर ले जाएगी जल्दी ही इसे शाम उठा कर सीने में छुपा शाम की आँखों से बचा कर इक लहर को हम लाए समुंदर से उठा कर हाँ वक़्त से पहले ही उड़ा देगी इसे सुब्ह रक्खी न गई चाँद से गर शब ये दबा कर इक सुब्ह भली सी मिरे नज़दीक से गुज़री मैं बैठा रहा हिज्र की इक रात बिछा कर फिर सुब्ह से ही आज अलम देख रहे हैं यादों की कोई फ़िल्म मिरे दिल में चला कर फिर चाय में बिस्कुट की तरह भूकी सी ये शाम खा जाएगी सूरज को समुंदर में डुबा कर

Swapnil Tiwari

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किरन इक मो'जिज़ा सा कर गई है धनक कमरे में मेरे भर गई है उचक कर देखती थी नींद तुम को लो ये आँखों से गिर कर मर गई है ख़मोशी छुप रही है अब सदास ये बच्ची अजनबी से डर गई है खुले मिलते हैं मुझ को दर हमेशा मिरे हाथों में दस्तक भर गई है उसे कुछ अश्क लाने को कहा था कहाँ जा कर उदासी मर गई है उजालों में छुपी थी एक लड़की फ़लक का रंग-रोग़न कर गई है वो फिर उभरेगी थोड़ी साँस भरने नदी में लहर जो अंदर गई है

Swapnil Tiwari

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टेबल लैंप जला रहता है कोना एक जगा रहता है दो लोगों के भी घर में मुझ से कोई न कोई ख़फ़ा रहता है हर दस्तक बेकार हुई है क्या इस घर में ख़ुदा रहता है थमता नहीं है दर्द का ट्रैफिक मेरा ज़ख़्म हरा रहता है हादसे भी होते रहते हैं मेरा दिल भी लगा रहता है

Swapnil Tiwari

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